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साधारण ऋतु नहीं माता पिता के जीवन का वसंत हैं बचपन!

  बचपन की छोटी-सी ऋतु बच्चों का बचपन बड़ा विचित्र होता है। जब चल रहा होता है तो लगता है कि बहुत लंबा है। घर में खिलौने बिखरे हैं। हर थोड़ी देर में—“पापा सुनो ना…” “मम्मी देखो ना…” खाना नहीं खाना। सोना नहीं है। सौ प्रश्न पूछने हैं। और हम सोचते हैं— थोड़ा बड़ा हो जाए तो कुछ चैन मिले। मिलेगा। लेकिन शायद तब पता चलेगा कि जिस शोर से चैन माँग रहे थे, वही घर की सबसे सुंदर ध्वनि थी। बच्चे हमारे बच्चे पूरे जीवन रहते हैं, लेकिन बच्चे बनकर बहुत थोड़े वर्ष रहते हैं। एक दिन खिलौने कम होने लगेंगे। फिर गोद में बैठना बंद। फिर उंगली पकड़कर चलना बंद। फिर विद्यालय के द्वार पर कहेगा— “आप यहीं छोड़ दो, मैं चला जाऊँगा।” और कुछ वर्षों बाद— “आपको आने की आवश्यकता नहीं है।” यह सब किसी घोषणा के साथ नहीं होता। बस धीरे-धीरे होता है। और जब तक हमें पता चलता है कि बचपन जा रहा है, तब तक वह काफी दूर निकल चुका होता है। लेकिन हमें उसे बड़ा करने की इतनी जल्दी क्यों है? आज के माता-पिता को देखकर कई बार लगता है कि हम माता-पिता कम और फल के व्यापारी अधिक हो गए हैं। कच्चा फल सामने रखा है और चिंता यह है कि जल्दी पक क्यों नहीं...