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द्वितीय गोधूली परिवार ऋषिकेश कैंप - नवंबर 2022 (शिविर स्थल तक कैसे पहुंचे?)

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गोधूलि परिवार चार दिवसीय  द्वितीय गोधूली परिवार ऋषिकेश कैंप द्वितीय गोधूली परिवार ऋषिकेश कैंप - नवंबर 2022 सुखद स्मृतियाँ : गोधूली परिवार द्वितीय ऋषिकेश कैंप (10 - 13 नवंबर 2022) / Gaudhuli Parivaar Rishikesh Camp (10-13 Nov 2022) https://gaudhuli.com/rishikeshcamp2022/   शिविर स्थल तक कैसे पहुंचे? जानकारी केवल पंजीकृत परिवारो के लिए यदि आपने पंजीकरण नहीं करवाया है और फिर भी आप शिविर में आना चाहते है तो किसी धर्मशाला, होटल, आश्रम या अन्य स्थान पर स्वयं की रुकने की व्यवस्था करके भी शिविर में न्यूनतम सहयोग राशि देकर भाग ले सकते है। यदि किसी कारणवश शिविर स्थल आश्रम में रहने का स्थान उपलब्ध होगा तो ही आपको देने का प्रयास किया जाएगा। ************* ट्रेन से कैसे पहुंचे? *************** अधिकांश ट्रेन आपको हरिद्वार तक मिलेगी एवं कुछ ही ट्रैन ऋषिकेश तक आती है परन्तु प्रचलति तोप से लोग टैक्सी या ऑटो से ऋषिकेश तक जाते है। हरिद्वार से ऋषिकेश की दूरी 30 किलोमीटर है। ऑटो आपको मुनि की रेती ऑटो स्टैंड तक छोड़ेगा वहां से ऑटो वाले को आपको "तपोवन पुलिस चौकी" तक जाने के लिए कहना है

भारत में अंग्रेजी राज का संक्षिप्त बही-खाता || THE BALANCE SHEET OF BRITISH RULE IN INDIA

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  THE BALANCE SHEET OF BRITISH RULE IN INDIA Some main items:   1)       Englishmen drain from India and take to England every year 50 crores of rupees ($167 million);   consequently   the Hindus have become so poor that the daily average income per capita is only 5 paisa (2.5 cents)   2)       The land tax is more than 65 percent of the net produce. 3)       The expenditure for 240 million (24 crore population) person on Education:           7¾ crores of rupees ($25,000,000) Sanitation:          2 crore of rupees ($6,000,000) But on army:      29 ½ crore of rupees ($97,000,000)   4)       Under British rule, the famines are ever on the increase, and in the last ten years 20 million (2 crore) men, women and children have died of starvation. 5)       From the plagues, 8 million (80 lakh) deaths have occurred during the last sixteen years, and the death rate during the last 30 years has steadily increased from the 24 per mile to upto 34 per mile. 6)       Means

सोनपापड़ी के साथ हुआ षड्यंत्र!

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 जिसे हरा न सको उसे यशहीन कर दो,उसका उपहास करो,उसकी छवि मलिन कर दो। बस ऐसा ही कुछ हुआ है इस सुंदर मिठाई के संग में भी। आपने इधर सोनपापड़ी जोक्स और मीम्स भारी संख्या में देखे होंगे। निर्दोष भाव से उ न पर हँस भी दिए होंगे। पर अगली बार उस बाज़ार को समझिए जो मिठाई से लेकर दवाई तक और कपड़ों से लेकर संस्कृति तक में अपने नाखून गड़ाये बैठा है।         एक ऐसी मिठाई जिसे एक स्थानीय कारीगर न्यूनतम संसाधनों में बना बेच लेता हो। जिसमें सिंथेटिक मावे की मिलावट न हो। जो अपनी शानदार पैकेजिंग और लंबी शेल्फ लाइफ के चलते आवश्यकता से अधिक मात्रा में उपलब्ध होने पर बिना दूषित हुए किसी और को दी जा सके, खोये की मिठाई की तरह सड़कर कूड़ेदान में न जा गिरे। आश्चर्य, बिल्कुल एक सुंदर, भरोसेमंद मनुष्य की तरह जिस सहजता के लिए इसका सम्मान होना चाहिए, इसे हेय किया जा रहा है।        एक काम कीजिये डायबिटिक न हों तो घर में रखे सोनपापड़ी के डिब्बों में से एक को खोलिए। नायाब कारीगरी का नमूना गुदगुदी परतों वाला सोनपापड़ी का एक सुनहरा, सुगंधित टुकड़ा मुँह में रखिये। भीतर जाने से पहले होंठों पर ही न घुल जाये तो बनानेवाले का नाम बदल द

जानिये असल में किस धन की है धनतेरस?

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जानिये किस धन की है धनतेरस ? क्यों बिना विवेक कुछ भी ख़रीद लेने का दिन नहीं है धनतेरस! और यह धन से सम्बंधित नहीं है ************************************* स्वदेशी एवं स्वास्थ्य के सन्दर्भ में धनतेरस का महत्व कुंठित एवं विकृत उपभोक्तावाद से प्रेरित बाजारीकरण के कारण धनतेरस को लेकर कुछ भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास एक प्रश्नावली के द्वारा : प्रश्न: धनतेरस में "धन" शब्द का क्या अर्थ है? उत्तर: यह बहुत कम लोग जानते है की वास्तव में धनतेरस में "धन" शब्द स्वास्थ्य के देवता धनवंतरी से लिया गया है कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। प्रश्न: अगर धन नहीं तो फिर धनतेरस का क्या महत्त्व है? उत्तर: देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें। प्रश्न: आज के दिन कुछ नया खरीदने की परंपरा क्यों है? उत्तर: समुद्र मंथन के समय धन्

विवाह की तैयारी है या दिखावे की?

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विवाहोत्सव : ज़रा सोचिए  क्या नाचने गाने को विवाह कहते हैं, क्या दारू पीकर हुल्लड़ मचाने को विवाह कहते हैं, क्या रिश्तेदारों और दोस्तों को इकट्ठा करके दारु की पार्टी को विवाह कहते हैं ? डीजे बजाने को विवाह कहते हैं, नाचते हुए लोगों पर पैसा लुटाने को विवाह कहते हैं, घर में सात आठ दिन धूम मची रहे उसको विवाह कहते हैं?  दारू की 20-25 पेटी लग जाए उसको विवाह कहते हैं ? किसको विवाह कहते हैं? विवाह उसे कहते हैं जो बेदी के ऊपर मंडप के नीचे पंडित जी मंत्रोच्चारण के साथ देवताओं का आवाहन करके विवाह की वैदिक रस्मों को कराकर पूरी शास्त्रोक्त विधि को निभाये । लोग कहते हैं कि हम आठ 8 महीने से विवाह की तैयारी कर रहे हैं । और पंडित जी जब सुपारी मांगते हैं , तो कहते हैं अरे वह तो भूल गए । जो सबसे जरूरी काम था वह आप भूल गए  । विवाह की सामग्री भूल गए।  फिर आप 10 महीने से विवाह की कौन सी तैयारी कर रहे हैं। विवाह की नहीं आप वास्तव में दिखावे की तैयारी कर रहे हो। लोन या कर्जा ले लेकर दिखावा कर रहे हो ।  हमारे ऋषियों ने कहा है कि जो जरूरी काम है वह करो । ठीक है ! अब तक लोगों की पार्टियां खाई है तो खिलानी भी पड

पूर्वजों को याद करने के उपलक्ष्य को मज़ाक bka विषय नही बनाना

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  श्राद्ध पक्ष को लेकर कई मज़ाक भरे सन्देशो का आदान प्रदान हो रहा है जिसमे ब्राह्मणो का खाने का वर्ल्ड कप से लेकर कौवो की मौज आदि का उल्लेख है व्यक्तिगत रूप से श्राद्ध पक्ष जैसे पवित्र पखवाड़े के विषय में ऐसे भद्दे फूहड़ मज़ाक मैं पसंद नहीं करता इस पखवाड़े में अपने पितरो / पूर्वजो को श्रद्धापूर्वक स्मरण करने प्रावधान है..... कोई भी ब्राह्मण न तो आपसे खीर पूरी खिलाने का आग्रह कर रहा है न कोई गाय, पशु या पक्षी अगर आप इनको भोग करवाने को मानते है तो  पालन करें और यदि नहीं तो अपने नित्य कार्य अन्य दिनों की तरह करते रहे क्योंकि जो मानते है उनके कहने से आप मानना शुरू नहीं करेंगे और आपके कहने से वो पालन करना छोड़ेंगे नहीं तो क्यों अपनी ऊर्जा नष्ट करें देश में और भी कई वास्तविक संकट है उनपर ध्यान केंद्रित करें उचित रहेगा धार्मिक आस्था और मान्यताओ के विषयो पर किसी तरह की भद्दे और भौंडे सन्देश भेजना या बहस करना मूर्खता है अतः न करें! ऐसे सन्देश भेजने वालो को विनम्र होकर परन्तु दृढ़ता पूर्वक यह सन्देश प्रेषित करें - अपनी जड़ो से जुड़े हुए वीरेंद्र की कलम से

पूर्वजो का धन्यवाद !

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यह चित्र 2012 आगरा रेलवे स्टेशन का है। इस से पहले मैं ऐसे कान साफ करवाना सुरक्षित नही समझता था। परंतु राजीव भाई को सुनकर पहली बार इस प्रकार से कान साफ़ करवाए थे। वो भी केवल 20 रु में जो आनंद आया मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता न डिग्री, न appointment, सेवा कभी भी कही भी। हमारे पूर्वजो के द्वारा इन कान साफ़ करने वाले लोगो की पूरी जमात खड़ी की गयी जिन्हें विशेष प्रक्षिशण दिया गया था कान की सभी परेशानियों के लिए यहाँ तक आपातकालीन स्थिति के लिए भी जिसमे कान में अगर कुछ फंस जाये तो यह आसानी से निकाल देते है ज्यादा बड़ा रोग हुआ तो आयुर्वेदिक वैध हुआ करते थे।  अब यही काम डिग्री के चक्कर में कुछ डॉक्टरों की बपौती बन गया है।  जिनके पास कुछ आधुनिक मशीने है जिसका खर्चा यह हमसे लेते है।   कान साफ़ होते देखना कई लोगो को बहुत भाता है इसीलिए यूट्यूब पर करोडो लोग कान को साफ़ होने के वीडियो को देखते है।  विदेशो में कोई सोच भी नहीं सकता कि सड़क किनारे बैठकर  कान साफ़ हो सकता है।  पहले के लोग अपनी पूरी दूकान अपनी बगल में लेकर चलते थे।    वो अलग बात है की आज इसमें कुछ गलत तरीके से धोखा देते है और पैसे कमाते है लेकिन