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हनुमान अंश : ₹10 लाख से ₹300 करोड़ तक…

हनुमान अंश : ₹10 लाख से ₹300 करोड़ तक…  जब मैंने पहली बार पूछा था— “क्या हनुमान अंश उत्तर भारत की कान्तारा बनेगी?” तब यह सवाल थोड़ा बड़ा लग रहा था। करीब ₹2 करोड़ की फिल्म। कोई बड़ा सितारा नहीं। कोई ऐसा प्रचार नहीं कि सुबह उठो तो हर जगह उसी का चेहरा दिखे। पहले दिन लगभग ₹10 लाख की कमाई। मतलब शुरुआत देखकर कोई भी कह देता— चलो, एक और छोटी धार्मिक फिल्म आई और चली गई। लेकिन गई नहीं। धीरे-धीरे लोग देखने लगे। फिर देखने वाले दूसरों से कहने लगे— “एक बार देख आओ।” और वही काम हो गया जो आजकल कई बार ₹50-100 करोड़ का प्रचार भी नहीं कर पाता। फिल्म ₹300 करोड़ के पार पहुँच गई। अब मुझे इसमें सबसे मजेदार बात यही लगती है— फिल्म नहीं बदली। दर्शक बढ़ता गया। हनुमान अंश   नीब करौरी बाबा के जीवन और हनुमान भक्ति से प्रेरित फिल्म है। इसलिए नाम देखकर अगर कोई यह सोचकर जाए कि अभी हनुमान जी आएँगे, पहाड़ उठाएँगे, VFX फटेगा और पर्दा हिलेगा— तो भाई, गलत फिल्म में आ गए। यह उस तरह की फिल्म नहीं है। यह सीधी है। बहुत सीधी। कई जगह इतनी सीधी कि लगता है थोड़ा और सिनेमाई हो सकती थी। कुछ दृश्य सच में फिल्म से ज्यादा अच्छे...
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चालीस के बाद आप बदलते हो या जीवन या दृष्टिकोण?

  शायद जीवन चालीस के बाद शुरू नहीं होता… पहली बार समझ में आना शुरू होता है चालीस की उम्र में कोई जादू नहीं होता। न अचानक बुद्धि खुलती है, न संसार बदल जाता है। लेकिन यदि आदमी ने पिछले चालीस वर्ष केवल काटे नहीं, थोड़े ध्यान से जिए हैं, तो एक बदलाव अवश्य आने लगता है— जिसे अब तक बहुत महत्वपूर्ण समझते थे, उसका महत्व अचानक कम होने लगता है। बीस-पच्चीस की उम्र में लगता है कि जीवन बहुत तेज भाग रहा है और हमें उससे भी तेज भागना है। कुछ बनना है। नाम करना है। अधिक कमना है। लोग क्या सोचते हैं, यह भी देखना है। जिस नौकरी में चयन नहीं हुआ, लगता है जीवन बिगड़ गया। जिस व्यक्ति ने ठुकरा दिया, लगता है हमारे भीतर ही कोई कमी है। किसी ने सम्मान नहीं दिया तो कई दिन तक वही बात घूमती रहती है। हर घटना बहुत बड़ी लगती है, क्योंकि उस उम्र में हम अपने बारे में एक पहचान बना रहे होते हैं—मैं कौन हूँ, मेरी क्या कीमत है, लोग मुझे कितना महत्व देते हैं। और मज़ेदार बात यह है कि सफलता की परिभाषा भी प्रायः हमारी अपनी नहीं होती। किसी ने बता दिया कि अच्छा पद मिल गया तो सफल। बड़ा घर हो गया तो सफल। गाड़ी बदल गई तो सफल। बैंक म...

पहले जेब रोकती थी, अब पेट रोकता है!

जीवन बड़ा विचित्र हिसाब रखता है। एक समय था जब आपकी जेब इतनी अनुमति नहीं देती थी कि मनपसंद और अच्छा भोजन खरीद सकूँ। जो सस्ता था, वही खा लिया। समोसा सस्ता है, फल महँगा है—समोसा सही। पराठे से पेट भर रहा है—सूखे मेवे कौन खरीदे? कोल्ड ड्रिंक \ चाय  \ बिस्कुट में काम चल रहा है—पोषण का हिसाब बाद में देखेंगे। और शरीर भी जवान था। जो डालो, सह लेता था। मीठा खा लिया। तला हुआ खा लिया। रात को देर से खा लिया। कभी बहुत खाया, कभी भूखे रहे। फिर भी अगले दिन शरीर ऐसे उठ खड़ा होता था जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं। युवा अवस्था की सबसे बड़ी भूल शायद यही है— शरीर बहुत कुछ सह लेता है, इसलिए हम समझ लेते हैं कि उसे कुछ हो ही नहीं रहा। जबकि शरीर भूलता नहीं है। बीस-पच्चीस की उम्र में जो अत्याचार हम उस पर करते हैं, चालीसके बाद वही शरीर धीरे-धीरे उनका हिसाब माँगना शुरू कर देता है। तब पता चलता है— जिस पेट को हम कूड़ेदान समझकर कुछ भी डालते रहे, उसकी भी स्मरणशक्ति थी। जिस नींद को काटकर काम किया, वह भी कहीं लिखी जा रही थी। जिस व्यायाम को कल पर टलते रहे, उसका भी लेखा था। जिस वजन को देखकर कहते रहे—“अभी क्या फर्क पड़ता है”—व...

साधारण ऋतु नहीं माता पिता के जीवन का वसंत हैं बचपन!

  बचपन की छोटी-सी ऋतु बच्चों का बचपन बड़ा विचित्र होता है। जब चल रहा होता है तो लगता है कि बहुत लंबा है। घर में खिलौने बिखरे हैं। हर थोड़ी देर में—“पापा सुनो ना…” “मम्मी देखो ना…” खाना नहीं खाना। सोना नहीं है। सौ प्रश्न पूछने हैं। और हम सोचते हैं— थोड़ा बड़ा हो जाए तो कुछ चैन मिले। मिलेगा। लेकिन शायद तब पता चलेगा कि जिस शोर से चैन माँग रहे थे, वही घर की सबसे सुंदर ध्वनि थी। बच्चे हमारे बच्चे पूरे जीवन रहते हैं, लेकिन बच्चे बनकर बहुत थोड़े वर्ष रहते हैं। एक दिन खिलौने कम होने लगेंगे। फिर गोद में बैठना बंद। फिर उंगली पकड़कर चलना बंद। फिर विद्यालय के द्वार पर कहेगा— “आप यहीं छोड़ दो, मैं चला जाऊँगा।” और कुछ वर्षों बाद— “आपको आने की आवश्यकता नहीं है।” यह सब किसी घोषणा के साथ नहीं होता। बस धीरे-धीरे होता है। और जब तक हमें पता चलता है कि बचपन जा रहा है, तब तक वह काफी दूर निकल चुका होता है। लेकिन हमें उसे बड़ा करने की इतनी जल्दी क्यों है? आज के माता-पिता को देखकर कई बार लगता है कि हम माता-पिता कम और फल के व्यापारी अधिक हो गए हैं। कच्चा फल सामने रखा है और चिंता यह है कि जल्दी पक क्यों नहीं...

त्रिफला कल्प | Trifala Kalp : जानिए 12 वर्ष तक लगातार असली त्रिफला खाने के लाभ! |

हिन्दी English आयुर्वेद • त्रिफला • 12 वर्ष का कल्प त्रिफला कल्प जानिए 12 वर्ष तक लगातार असली त्रिफला लेने की पारंपरिक विधि त्रिफला केवल कभी-कभार पेट साफ करने वाला चूर्ण नहीं माना गया। आयुर्वेद में इसे रसायन के रूप में भी स्थान मिला है। यहाँ त्रिफला का सही अनुपात, आयु के अनुसार मात्रा, ऋतु के अनुसार अनुपान, 12 वर्ष के कल्प और इसके अन्य पारंपरिक प्रयोगों को सरल और व्यवस्थित रूप में रखा गया है। हरड़ बहेड़ा आँवला घी शक्कर संग खाए हाथी दाबे कांख में और चार कोस ले जाए 1 कोस लगभग 3–4 किलोमीटर त्रिफला आखिर है क्या? आयुर्वेद के अनुसार हरड़, बहेड़ा और आँवला—इन तीन फलों के मिश्रण को त्रिफला कहा जाता है। परंपरागत आयुर्वेदिक दृष्टि में इसे वात, पित्त और कफ के संतुलन से जोड़कर देखा गया है। पुराने वर्णनों में त्रिफला को दीर्घकालीन पोषण और कायाकल्प से भी जोड़ा गया है। त्रिफला किस अनुपात में बनता है? अभ...