केवल कर्म करना ही हाथ में है! कई बार जीवन में कुछ ऐसा होता है जो उस समय हमें बिल्कुल गलत लगता है। बस छूट गई। कहीं चयन नहीं हुआ। जिस पर भरोसा था, वही छोड़कर चला गया। और हम तुरंत फैसला सुना देते हैं— मेरे साथ गलत हो गया। पर हमें सच में पता है कि गलत क्या हुआ? हम तो केवल उतना देख पा रहे हैं जितना इस समय हमारे सामने है। आगे उस रास्ते पर क्या था, यह हमें कहाँ मालूम? और मज़े की बात यह है कि जिस जीवन पर हम इतना नियंत्रण चाहते हैं, उसमें वास्तव में हमारा नियंत्रण है ही कितना? अपने शरीर को ही देख लीजिए। करोड़ों कोशिकाएँ हर समय अपना काम कर रही हैं। हृदय धड़क रहा है। खून बह रहा है। शरीर के भीतर न जाने कितनी प्रक्रियाएँ चल रही हैं। आप उनमें से कितनी चला रहे हैं? कुछ भी नहीं। थोड़ा बाहर आइए। पृथ्वी घूम रही है। ग्रह अपनी कक्षाओं में चल रहे हैं। सूर्य कब उगेगा, ऋतु कब बदलेगी, वर्षा कब होगी— इनमें से किसी पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं। सूक्ष्मतम कोशिका से लेकर विराट ग्रह-नक्षत्रों तक व्यवस्था हमारे आदेश से नहीं चल रही। फिर भी आदमी को भ्रम यह है कि मेरा पूरा जीवन मेरी योजना के हिसाब से ही चलना चाहिए! यहीं...
2029 में यदि वर्तमान सरकार या कहे मोदी हारते हैं तो बात सिर्फ सरकार बदलने की नहीं होगी। मामला उससे बड़ा है। भारत आज जिस दिशा में जा रहा है, उसी दिशा में यदि पाँच साल और चला तो आज की कई गड़बड़ियाँ इतनी गहरी हो सकती हैं कि बाद में उन्हें ठीक करना संभवतः असंभव हो जाये। और हाँ… यह भी मत सोच लेना कि कोई दूसरा प्रधानमंत्री आएगा तो अगले दिन सब ठीक हो जाएगा। इतना बड़ा देश कोई खराब मोबाइल नहीं है कि restart किया और चल पड़ा। जो चीजें दस-पन्द्रह साल में बिगड़ी हैं, वे दस-पन्द्रह महीने में ठीक नहीं होंगी। अगला प्रधानमंत्री सिर्फ लोकप्रिय होना काफी नहीं। उसे पढ़ा-लिखा होना चाहिए। शासन समझना चाहिए। संस्थाएँ क्यों बनाई गई हैं, यह समझना चाहिए। हर चीज को अपने हाथ में लेने की बीमारी नहीं होनी चाहिए। और सबसे जरूरी— उसमें धैर्य होना चाहिए। क्योंकि देश चलाना चुनाव जीतने से अलग काम है। चुनाव नारों से जीते जा सकते हैं। देश नारों से नहीं चलता। इसलिए 2029 में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए— मोदी रहें या मोदी जाएँ? सवाल यह होना चाहिए— भारत को अगला नेतृत्व कैसा चाहिए? मोदी नहीं तो कौन? असल सवाल होना चाहिए— मोदी के...