आज की नारी — पढ़ी-लिखी गांधारी भाग 2 — Junk का अर्थ भी पता है... फिर भी बच्चे को खिला रही है आज की माँ अनपढ़ नहीं है। साक्षर है लेकिन शिक्षित नहीं उसे पता है कि Junk Food कोई स्वास्थ्यवर्धक भोजन नहीं है। वह अंग्रेज़ी भी समझती है, Google भी चला लेती है, Instagram पर हेल्थ अच्छे रखें वाली reels भी देखती है और बच्चे को कौन-सा स्कूल दिलाना है इस पर तीन महीने शोध भी कर सकती है। और Junk का अर्थ भी जानती है कूड़ा। कचरा। ऐसी वस्तु जिसका वास्तविक मूल्य बहुत कम हो। अब विडंबना देखिए। जिस भोजन के नाम में ही दुनिया ने चेतावनी लिख रखी है, वही हम अपने बच्चों को प्यार से खिला रहे हैं। कभी-कभी तो लगता है— पढ़ी-लिखी होकर भी नहीं, शायद पढ़ी-लिखी होने के कारण ही खिला रहे हैं। क्योंकि अब घर की बनी चीज़ साधारण लगने लगी है और चमकीला पैकेट आधुनिक। बच्चा रोया—पैकेट खोल दो। विद्यालय जाना है—बिस्किट रख दो, और थोड़ा आधुनिक दिखना हो तो उसे कुकीज़ कह दो। बाज़ार निकले—चिप्स पकड़ा दो। लंबी यात्रा है—कुछ ताड़ के तेल से लदे पैकेटबंद नाश्ते रख लो। जन्मदिन है—केक, कोला, पैकेट वाला रस और इतनी रंग-बिरंगी ची...
तीन दिन की छुट्टी मिली… और हम शान्ति खोजने लाखों की भीड़ लेकर पहाड़ पहुँच गए! तीन दिन की छुट्टी क्या मिली, पर्यटक बनकर तीर्थाटन करने का ढोंग करने निकल पड़े दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और आसपास के लोगों को अचानक प्रकृति, अध्यात्म और पहाड़ों से प्रेम हो गया। और प्रेम भी ऐसा कि हिमाचल से उत्तराखण्ड तक महाजाम लग गया। कैंची धाम में तिल रखने तक की जगह नहीं। समाचार के अनुसार शम तक लगभग 50,000 श्रद्धालु दर्शन कर चुके थे। कुल्लू में दो दिन में एक लाख से अधिक पर्यटक पहुँच गए। होटल लगभग भर गए। नैनीताल में लोग होटल नहीं मिलने पर सड़को के किनारे सो रहे है। जागेश्वर में पार्किंग भर गई तो वाहन सड़कों पर खड़े होने लगे। शिमला-मनाली की सड़कों पर गाड़ियों की पंक्तियाँ। और यह सब देखकर मेरे मन में एक बहुत छोटा-सा प्रश्न आया हम पहाड़ों पर शान्ति खोजने जाते हैं और अब पहाड़ो के लोग शान्ति ढूंढ रहे है! सुबह घर से निकलेंगे बड़ी गाड़ी में। चार पांच लोग बैठेंगे। पूरा सामान भरेंगे। रास्ते में प्लास्टिक की बोतलें खरीदेंगे। पैकेट वाला खाना खाएँगे। पहाड़ पर पहुँचकर गाड़ी खड़ी करने की ज...