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लाया है गोधूली परिवार - 21 नए विशुद्ध उत्पादों का उपहार

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लाया है गोधूली परिवार - नई वेबसाइट के साथ 21 नए विशुद्ध उत्पादों का उपहार  इस वर्ष गोधूली परिवार ( Gaudhuli.com ) द्वारा पिछले 6 माह में बहुत ही परिश्रम द्वारा  कई विशुद्ध उत्पादों को आपके लिए चुना गया है  अब उन्हें संतोषजनक रूप से स्वयं प्रयोग कर आपके समक्ष प्रस्तुत करते समय अत्यंत हर्ष हो रहा है  अधिक जानकारी हेतु नीचे दिए गए विवरण पर क्लिक करें इन उत्पादों का  आवश्यकतानुसार प्रयोग करें करें  1. 100% Pure & Natural Extra Strong Asafoetida (Heeng / Hing) | 100% शुद्ध प्राकृतिक हींग **************************** 2. Gonyle | गोनाईल – Divine & Satvik Floor Cleaning Alternative **************************** 3. Coconut Water Powder | नारियल पानी पाउडर **************************** 4. Organic Coconut Sugar **************************** 5. Cococnut Milk Powder **************************** 6. Handmade Goat Milk Soap | बकरी के दूध का हस्तनिर्मित साबुन – (No Artificial Colours and Fragrance) **************************** 7. Pure Hawan Samagri / शुद्ध हवन सामग्री – 42 श्रेष्ठ जड़ी बूटियों का

कोई भी स्कूल "टीकाकरण अनिवार्य है" नहीं लिख सकता!

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  "स्कूल में टीकाकरण अनिवार्य है" यदि आपको भी इस तरह के सन्देश आपके बच्चे के स्कूल से आ रहे है  जिसमे आपके क्षेत्र के कलेक्टर या डीएम का नाम लिखकर "टीका अनिवार्य है"  लिखा जा रहा है तो यह पूरी तरह से गैरकानूनी है और स्कूल पर सख्त कार्यवाही हो सकती है।   ध्यान रखें कि आज तक बच्चो या बड़ो को लगने वाला कोई भी टीका अनिवार्य नहीं है बच्चो का टीकाकरण बिना माता-पिता की सहमति के हो ही नहीं सकता।   यदि स्कूल ज़बरदस्ती करें तो कृपया उनसे कलेक्टर या डीएम का लिखित आर्डर मांगे जिसमे  टीका अनिवार्य है ऐसा लिखा गया है या उनसे स्कूल के letterhead पर लिखित में मांगे कि यदि बच्चे को टीके से कोई दुष्प्रभाव हुआ तो इसकी ज़िम्मेदारी स्कूल की होगी।   यदि स्कूल फिर भी न माने या आपको किसी प्रकार की धमकी दी जाती है तो इसकी जानकारी    virendersingh16@rediffmail.com पर भेजे  मेल में यह जानकारी भी साथ में भेजे :  1. टीके से सम्बंधित स्कूल से भेजा गया सन्देश या आदेश का स्क्रीनशॉट  2.. स्कूल का नाम  3. प्रिंसिपल का नाम एवं मोबाइल नंबर  Awaken India Movement की टीम के साथ मिलकर हम यथासंभव आपका सहयोग

त्रिफला खाकर हाथी को बगल में दबा कर 4 कोस ले जाएँ! जानिए 12 वर्ष तक लगातार असली त्रिफला खाने के लाभ!

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वह सब जो आप त्रिफला के विषय मे नही जानते! जानिए 12 वर्ष तक लगातार असली त्रिफला खाने के लाभ! त्रिफला खाकर हाथी को बगल में दबा कर 4 कोस ले जाएँ! गोधूली परिवार द्वारा प्रमाणित सर्वश्रेष्ठ त्रिफला गुरुकुल प्रभात आश्रम का *त्रिफला सुधा* त्रिफला के विषय मे सरल एवं विस्तार पूर्वक जाने की क्यो कहा जाता है कि हरड़ बहेड़ा आंवला घी शक्कर संग खाए हाथी दाबे कांख में और चार कोस ले जाए (1 कोस = 3-4 km) वात पित कफ को संतुलित रखने वाला सर्वोत्तम फल त्रिफला वाग्भट्ट ऋषि के अनुसार इस धरती का सर्वोत्तम फल त्रिफला लेने के नियम- त्रिफला के सेवनसे अपने शरीरका कायाकल्प कर जीवन भर स्वस्थ रहा जा सकता है। आयुर्वेद की महान देन त्रिफला से हमारे देश का आम व्यक्ति परिचित है व सभी ने कभी न कभी कब्ज दूर करने के लिए इसका सेवन भी जरुर किया होगा पर बहुत कम लोग जानते है इस त्रिफला चूर्ण जिसे आयुर्वेद रसायन मानता है। अपने कमजोर शरीर का कायाकल्प किया जा सकता है। बस जरुरत है तो इसके नियमित सेवन करने की, क्योंकि त्रिफला का वर्षों तक नियमित सेवन ही आपके शरीर का कायाकल्प कर सकता है। सेवन विध

बासौड़ा (शीतला अष्टमी) और विटामिन B12 का सम्बन्ध!

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  विटामिन B -12 का प्राकृतिक रूप से पाने का उपाय है शीतला अष्टमी जिसे बासोड़ा भी कहते है यह बासोड़ा त्यौहार होली के बाद आनी वाली अष्टमी या कई स्थानों पर होली दहन के अगले सोमवार को भी मनाया जाता है। परन्तु एक दिन आगे पीछे यदि हो भी जाएँ तो निश्चिंत रहे और आप अपनी परंपरा अनुसार मनाएं और यदि आज तक आपके घर में नहीं मनाई गई तो अष्टमी के दिन से मनाना शुरू कर दें। इसे अंधविश्वास आदि न मानकर इसका धार्मिक और आयुर्वेदिक महत्त्व समझकर मनाना शुरू करें क्योंकि इसका लाभ ही होगा नुक्सान कुछ नहीं। इस दिन एक रात पहले बिना लहसुन प्याज़ का भोजन जैसे गुड़ के चावल, दही, गुलगुले, हलवा, राबड़ी आदि बनाकर उन्हें सुबह बासी खाया जाता है कभी गुड़ के चावल कभी रात में मिस्सी रोटी को देसी गोमाता का घी लगाकर रख दें और सुबह मीठी दही से खाया जा सकता है। तो अगले लगभग दो सप्ताह तक बदल बदल कर कभी कभी ऐसा बासी भोजन करें। गुड़ और चावल यह दोनों जैविक हो तो और बेहतर जो गोधूली ( Gaudhuli.com ) के संस्थापक होने के कारण उपलब्ध रहते ही है। सूर्योदय से पहले शीतला माता के मंदिर में या मंदिर न हो तो चौराहे पर बासी चावल और गुलगुले प्र

महाभारत से कहाँ भारत!

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महाभारत से कहाँ (गया) भारत   पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें । *पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ।* "पुस्तक के बीच  *पौधे की पत्ती* *और मोरपंख रखने* से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था"।  कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था । *हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था ।* *माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी , न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी* ।  सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।  *एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा* हमने कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं ।  *स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?* पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया

"जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?"

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"जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?" बचपन में सुबह हम जब बिस्तर से नहीं उठते थे ऊंघते रहते थे तो माँ एक वाक्य कहती थी कि "जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?" आज इस समाज पर यह बात सटीक बैठती है जो अधिकतर अपनी जीभ के स्वाद का गुलाम बन, जान-बूझकर अनजान बन वही खा रहा है जिसने आपके घर के सदस्य को अस्पताल का सदस्य (मरीज़) बनाया क्योंकि ऐसे अस्पताल में आने वाले लोगो को सोशल मीडिया के युग में सही गलत का पता न हो वह मैं मान ही नहीं सकता। आने वाली पीढ़ियां हमारे आज का आचरण से निर्मित होती है इस बात को ध्यान में रख यह पोस्ट पढ़ें किसी मित्र के कार्य हेतु एक तथाकथित चमक दमक होटल जैस हो(स्पी)टल में जाना हुआ मरीज़ो से भरा और परन्तु इलाज से खाली था. लाइन लगाकर लोग पैसा जमा करने की होड़ में थे और समय उनके पास भरपूर था।  यह मेरा मानना है की पैसा और समय सबके पास होता है और इसे लूटने की कला आधुनिक अस्पतालों ने बखूबी सीख लिया है। यह जो उदहारण मैं दे रहा हूँ उस से पुनः यह बात साबित हो जाती है की जिस चिकित्सा व्यवस्था वालो को इतना भी भान नहीं है की अस्पताल में स्वस्थ भोजन का क्या अर्थ य

सोचा कुछ मित्रों से साझा करूँ - पवन गुप्ता जी

    मेरे जैसा ‘ पढ़ा - लिखा ’ आदमी स्कूल जैसी कैद में 10-12 वर्ष रहने के बाद से ही , अपने को समझदार मानने लगता है। और अगर वह पढ़ने - लिखने में , स्कूल की debate वगैरह में हिस्सा लेता रहा और एक छोटी मोटी प्रसिद्धि उसे मिल जाय तो उसकी यह मान्यता और पक्की हो जाती है। और इसके बाद के वर्ष , जिसमे आगे की पढ़ाई जिसमे साथ साथ अपनी पहचान बनाने की कोशिश चलती रहती है , इस मान्यता को और घनीभूत करते चले जाते हैं।   यह मान्यता एक तरफ एक प्रकार का बाहरी आत्म - विश्वास देती है , जिसका   इस भौतिक संसार में लाभ भी मिलता है। पर कुछ लोगों को , शायद वे भाग्यशाली होते हैं , एक समय के बाद इस मान्यता के खोखलेपन का अहसाह होने लगता है।   यह पहचान ( identity) किस कदर हमारे दिमाग को लगभग बंद सा कर देती है , बने - बनाए ढर्रे से बाहर सोचने ही नहीं देती ; किस कदर हमे असुरक्षित और भयभीत कर देती है कि हम अपनी पहचान को बनाए रखें , टिकाये रखे , वह कहीं धूम