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जानिये असल में किस धन की है धनतेरस?

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जानिये किस धन की है धनतेरस ? क्यों बिना विवेक कुछ भी ख़रीद लेने का दिन नहीं है धनतेरस! और यह धन से सम्बंधित नहीं है ************************************* स्वदेशी एवं स्वास्थ्य के सन्दर्भ में धनतेरस का महत्व कुंठित एवं विकृत उपभोक्तावाद से प्रेरित बाजारीकरण के कारण धनतेरस को लेकर कुछ भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास एक प्रश्नावली के द्वारा : प्रश्न: धनतेरस में "धन" शब्द का क्या अर्थ है? उत्तर: यह बहुत कम लोग जानते है की वास्तव में धनतेरस में "धन" शब्द स्वास्थ्य के देवता धनवंतरी से लिया गया है कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। प्रश्न: अगर धन नहीं तो फिर धनतेरस का क्या महत्त्व है? उत्तर: देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें। प्रश्न: आज के दिन कुछ नया खरीदने की परंपरा क्यों है? उत्तर: समुद्र मंथन के...

"जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?"

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"जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?" बचपन में सुबह हम जब बिस्तर से नहीं उठते थे ऊंघते रहते थे तो माँ एक वाक्य कहती थी कि "जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?" आज इस समाज पर यह बात सटीक बैठती है जो अधिकतर अपनी जीभ के स्वाद का गुलाम बन, जान-बूझकर अनजान बन वही खा रहा है जिसने आपके घर के सदस्य को अस्पताल का सदस्य (मरीज़) बनाया क्योंकि ऐसे अस्पताल में आने वाले लोगो को सोशल मीडिया के युग में सही गलत का पता न हो वह मैं मान ही नहीं सकता। आने वाली पीढ़ियां हमारे आज का आचरण से निर्मित होती है इस बात को ध्यान में रख यह पोस्ट पढ़ें किसी मित्र के कार्य हेतु एक तथाकथित चमक दमक होटल जैस हो(स्पी)टल में जाना हुआ मरीज़ो से भरा और परन्तु इलाज से खाली था. लाइन लगाकर लोग पैसा जमा करने की होड़ में थे और समय उनके पास भरपूर था।  यह मेरा मानना है की पैसा और समय सबके पास होता है और इसे लूटने की कला आधुनिक अस्पतालों ने बखूबी सीख लिया है। यह जो उदहारण मैं दे रहा हूँ उस से पुनः यह बात साबित हो जाती है की जिस चिकित्सा व्यवस्था वालो को इतना भी भान नहीं है की अस्पताल में स्वस्थ भोजन का क्या अर्थ य...

पेट में मोम (WAX) जमा कैसे करें?

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पेट में मोम (WAX) जमा कैसे करें? यह बहुत आसान है!  Disposable पेपर कप में चाय, पानी दूध आदि आदि प्रतिदिन प्रयोग करके यह आसानी से किया जा सकता है  आइये जानते है कैसे? **************************************************** आखिरकार, आज का युग सफाई पसंद है वो जीवन में हर पहलु में डिस्पोजेबल (Disposable) तकनीक का प्रयोग करता है चाहे वो रिश्ते हो या बर्तन USE and THROW! विशेषकर शादियों में, बड़े बड़े कॉर्पोरेट दफ्तरों में छोटे छोटे ढाबो पर, चाय की दुकान पर, ट्रेन में, बस में और न जाने कहाँ कहाँ सब विदेशियों की तरह डिस्पोजेबल प्रयोग करने लगे है। क्योंकि सब बहुत पढ़े लिखे है कोई गलत काम नहीं करते। बर्तन जूठा भी नहीं करते और यह सोचकर की यह प्लास्टिक का कचरा चन्द्रमा पर चला जायेगा अपनी जीवन शैली में सब कुछ Disposable प्रयोग करने लगे। वैसे लिख तो दिया है की जनहित में जारी लेकिन ऐसे जन का हित करने के मन नहीं है जो जानबूझ कर अपनी आने वाली पीढियों के लिए संस्कारो की नहीं बल्कि दिल्ली जैसे कचरे के पहाड़ और बीमारी से भरे एक समाज की विरासत छोड़ कर जायेगा। कैसे बनता है यह? ...

प्राइवेट ट्रेन खुद तय करेंगी अपना किराया, सरकार देगी छूट

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 प्राइवेट ट्रेन खुद तय करेंगी अपना किराया, सरकार देगी छूट ************************************************************* निजी कंपनियों को ट्रैन का किराया अपनी मर्ज़ी से तय करने की मिली छूट अब सरकार को क्या दोष दें, इतना तो समझ आ गया है  इस PM की कुर्सी पर कोई पार्टी आ जाये, देश उसी दिशा में जायेगा जहाँ उसे वैश्विक माफिया शक्तियां ले जाएँगी।  इस विषय का इंतज़ार रहेगा की इन ट्रैन में सांसदों को मुफ्त में ढोया जायेगा या नहीं? अब इस कड़वे निर्णय को सही साबित करने के लिए टिपण्णी में बहुत ही सकारात्मक शब्दों का शहद लगाकर हमें चटवाया जायेगा और उस निर्णय के अलसी स्वाद के आने तक हम वाह वाह करेंगे और बाद में आह करेंगे लेकिन बहुमत जो वोटिंग मशीन के दम पर मिला है उसका असली उद्देश्य तो अभी पूरा करना है।   अब हमें सरकार विरोधी, वामपंथी, कांग्रेसी और इस कड़वे निर्णय को सही साबित करने के लिए टिपण्णी में बहुत ही सकारात्मक शब्दों का शहद लगाकर हमें चटवाया जायेगा और उस निर्णय के असली स्वाद के आने तक हम वाह वाह करेंगे और बाद में आह करेंगे हास्यास्पद है कि इन निजी कंपनियों के लिए ट्रैन कि...

मोदीजी की थोपी गई सकारात्मक छवि ही देश का काल न बन जाएं!

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मोदीजी की थोपी गई सकारात्मक छवि ही देश का न बन जाएं! ......बहुत खतरनाक महामारी है, मोदी बचा रहा है अन्यथा यहाँ भी सड़कों पर लाशों के ढेर लगे होते, कोई उठाने वाला नहीं होता,  पूरी दुनिया में देखा नहीं क्या? दूसरे देशों में लोग जरूरत न हो तो खिड़की भी नहीं खोलते  और यहाँ कितने ‘अनएजुकेटेड’ और जाहिल लोग है, किसी भी बिना ‘स्टैण्डर्ड’ की दूकान से सामान खरीद लेंगे, गाँव के लोग तो बिलकुल उजड्ड हैं, इनके क्या है फालतू बार बार बाहर निकलेंगे (बेचारा जिस आदमी का काम ही बार बार बाहर जाने का है, वह भी इनके लिए फालतू है), हम तो निकलते ही नहीं हैं किसी के घर भी नहीं जाते, उसके यहाँ पानी भी नहीं पीते, कुछ हो गया तो? भारत  के लोग बहुत लापरवाह हैं, सब्जियां लाते ही साबुन से धोकर दो दिन रख दो फिर काम में लो.....बाहर तो निकलो ही मत आदि आदि और न जाने क्या क्या? पिछले पांच महीने से हमारे पडोसी भाईसाहब और उनके जैसे बहुत लोग यही सब ज्ञान बाँट रहे हैं, मैंने पाया कि इनमें ज्यादातर लोग वे हैं जिनके घर में अच्छा वेतन या पेंशन आती है या अन्य बहुत अच्छे आय के स्त्रोत है और ऐसे लोगों को अपना भविष्य...

वामपंथी और क्रन्तिकारी होने में अंतर है!

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वामपंथी और क्रन्तिकारी होने में अंतर है! ********************************** वामपंथियों को अपनी विचारधारा की चिंता है देश से कोई लेना देना नहीं परन्तु हमें केवल अपने देश की और आने वाली पीढ़ी से लेना देना है कहाँ गए बड़े बड़े youtube चैनेलो के कर्ताधर्ता बड़े देशभक्त बने फिरते है, जान देना तो छोड़ो youtube चैनल डिलीट न हो जाये इस डर से इस वायरस के षड्यंत्र पर चुप्पी साध ली Thanks Bharat वाला भी भारत को थैंक्स कहकर इंडिया में चला गया क्या? यही हाल और बहुत से तथाकथित सोशलमीडिया क्रांतिकारियों का है पुष्पेंद्र जी को तो हिन्दू मुस्लिम से फुर्सत नहीं! उनका दोष नहीं है! इस विषय पर 100 एपिसोड बनाने का दावा सुदर्शन चैनल वाले की भी २ एपिसोड दिखा कर हवा निकल गई संघ ने तो जैसे अपने मुँह पर हाथ रखकर ऊपर से मास्क कसकर बाँध लिए है बड़े बड़े तथाकथित संत तो खुद वायरस से डर के बैठे है और नहीं भी डर रहे तो कौन सरकार से उलझे? हमारा मास्क जलाने की बात सुनकर तो कई लोगो को दस्त लग गए मास्क जलाना तो दूर प्रोफाइल पर मास्क विरोधी फोटो का बैनर लगाने की हिम्मत नहीं कर पाए कई तो! सरकार की गलत नीति का ही विरोध हम करते है ल...

कुछ पुरानी भावुक यादें....!

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  कुछ पुरानी भावुक यादें.... हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या मूत्र करने की स्थिति में होता था तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके, यह आम चलन था। हमने यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देख हुई हैं। जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना उन महान पुरखों में जन्मजात होती थी जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं। यह सब अभी 25-30 वर्ष पूर्व तक होता रहा है। उस जमाने का देसी घी यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि आज कई हज़ार रुपये किलो तक बिक सकता है। उस देसी घी को किसान विशेष कार्य के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को पिलाता था। टटीरी नामक पक्षी अपने अंडे खुले खेत की मिट्टी पर देती है और उनको सेती है। हल चलाते समय यदि सामने कहीं कोई टटीरी चिल्लाती मिलती थी तो किसान इशारा समझ जाता था और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ देता था। उस जमाने में आधुनिक शिक्षा नहीं थी। सब आस्तिक थे। दोपहर को किसान, जब आराम करने का समय होता तो सबसे पहले बैलों को पानी पिलाकर चारा ड...

टीके से मृत्यु का 2 सप्ताह में तीसरा मामला ! टीकाकरण के बाद कानपुर में दो बच्चों की मौत से मचा हड़कंप, सीएमओ ने स्टाॅक सील कर दिए जांच के आदेश

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टीके से मृत्यु का 2 सप्ताह में तीसरा मामला  ****************************************** दुनिया में एक माता की गोद में अपने हँसते खेलते बच्चे के शव से बड़ा दुःख शायद ही कोई और हो  जिस बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य की कामना से सरकार द्वारा चलाये जा रहे तथाकथित स्वास्थ्य अभियान पर विश्वास कर अपने बच्चो को इन सरकारी चमचो के हाथो में सौंप कर क्या पता था कि बच्चा न तो स्वस्थ मिला न बीमार मिला वह मृत्यु को ही मिला  जब यह सरकारी गुलाम टीके न लगवाने पर माता-पिता से लिखित में मांगते है की यदि टीके न लगाने के कारन बच्चे को कुछ बीमारी हुई तो ज़िम्मेदार माता-पिता होंगे।  अब इस सरकारी तंत्र से पूछो की अपने बच्चे की भलाई माता पिता बेहतर सोचे सकते है या ये सरकारी नौकर जिन्हे ऊपर से आदेश पर बिना बुद्धि के टारगेट पूरा करने की  जल्दी होती है लेकिन अब जब टीके लगने के बाद बच्चे की मृत्यु हो गई अब किसकी ज़िम्मेदारी है? लेकिन नहीं नियम कानून तो सब इनकी संपत्ति है जैसे भी हो तोड़ मरोड़ कर हमें चुप करवा देंगे  अभी के लिए तो हर एक ऐसे समाचार को अधिक से अधिक आग की तरह फैलाएंगे लेकिन हम चुप नहीं...

घी क्यों और कितना खाएं? - इस विषय पर संक्षिप्त परन्तु तृप्त करने योग्य जानकारी।

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घी क्यों और कितना खाएं? इस विषय पर संक्षिप्त परन्तु तृप्त करने योग्य जानकारी। चाय, हृदय रोगी, मोटापा, जोड़ो के दर्द से मुक्ति सुंदर त्वचा के इक्छुक अवश्य पढ़ें बिना घी की रोटी खाने वालों आपको मुर्ख बनाया गया है, जानिए .....सच्चाई क्या है दोस्तों, हर घर से एक आवाज जरुर आती है, “मेरे लिए बिना घी की रोटी लाना”, आपके घर से भी आती होगी, लेकिन घी को मना करना सीधा सेहत को मना करना है। लोगो तला हुआ या चिकनाहट वाले भोजन में अंतर नही पता अतः वह घी से दूरी बना लेते है। पहले के जमाने में लोग सामान्य दिनचर्या में घी का निसंकोच प्रयोग करते थे। इस लेख में घी का अर्थ है देसी गाय का वैदिक विधि से बिलोने से बना शुद्द देशी घी। मलाई से या किसी और शॉर्टकट से बना घी जैसा पदार्थ घी नही है। घी को अच्छा माना जाता था और कोलेस्ट्रोल और हार्ट अटैक जैसी बीमारियाँ कभी सुनने में भी नही आती थी। लेकिन फिर आरंभ हुआ घी का योजनाबद्ध नकारात्मक एवं गलत प्रचार। बड़ी बड़ी विदेशी कंपनियों ने डॉक्टरों के साथ मिलकर अपने बेकार और अनावश्यक उत्पादों का बाजार खड़ा कराने के लिए लोगों में घी के प्रति भ्रम फैलाया और कहा कि "घी से मोटा...