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मूल से अधिक प्यारा ब्याज होता है!

मूल से अधिक प्यारा  ब्याज  होता है  मूल से अधिक प्यारा  ब्याज  होता है इस चित्र में खिड़की के बाहर मेरे पिता किसी काम से दिल्ली रुके और हमे छोड़ने स्टेशन पर आये थे या कहूँ की अपने पोता पोती को छोड़ने आए थे। पोते को फल आदि देकर ट्रेन चलने से 10 मिनट पहले डिब्बे से उतर गए परंतु उनका पोता गव्यांश उन्हें देख लेगा तो रोयेगा इसीलिए जब तक ट्रेन नही चली तब तक बाहर छुप कर खड़े रहे। चाहते तो जा सकते से लेकिन गए नही। मन में तो था की उनका पोता एक नज़र देख कर उनकी ओर मुस्करा दे लेकिन पता था की देखते ही रोएगा तो छुपम छुपाई का खेल यूँ चला कि उसे देखना तो है लेकिन दिखना नही है। छुपम छुपाई का खेल जोरो पर था की ट्रेन खिसकने लगी। दादा खिड़की की ओर लपके और लगे हाथ हिलाने। ऐसे में कुछ नया कहने को नही होता बस अपनो की वो झलक भर दिख जाए उसी मे जीवन निहाल हो जाता है। पोता चलती गाड़ी के आनंद में मस्त था और दादा को हाथ हिलाते नही देखा तो उसके आनंद में ही अपना आनंद खोज कर दादा ने गाड़ी के साथ अपनी छोटी सी दौड़ समाप्त की और मन में संतोष किया की च...

Don't Say "Cheese", Say "Ghee"

Don't Say "Cheese", Say "Ghee" कैसे बनता है गंगातीरी गाय का सूर्य तापित घृत?

बचपन की गोधूलि वेला

बचपन की गोधूलि वेला गोधूलि का अर्थ है संध्या के समय जंगल से चरकर आती हुई गाय के खुरो से उड़ती हुई पवित्र धूल परन्तु जिसने इस गोधूलि वेला के केवल शाब्दिक अर्थ को समझा और प्रत्यक्ष अनुभव से आज तक वंचित वह अभागा ही कहलायेगा। इसका कारण यह है की इस शब्द का केवल इतना सा अर्थ नहीं है, इसके अनेक और गहरे अर्थ है। मेरा व्यक्तिगत मानना है की हिंदी साहित्य को तब तक सही अर्थो में नहीं समझा जा सकता जब तक आपने स्वयं ग्रामीण परिवेश निकटता से नहीं देखा है। 1980 से 1990 के बीच जन्मी पीढ़ी उन कुछ भाग्यशाली अंतिम पीढ़ियों में से है जिन्होंने इसका अनुभव किया है। राजस्थान के नीमराना के किले से 10 किलोमीटर दूर स्थित मेरे पैतृक गाँव में बचपन मैंने चूना बनते भी देखा है, ऊँट से बंधी रस्सी पर बैठकर कुए से पानी भी खींचा है, चूल्हे के लिए जंगल से लकड़ी भी चुनी है, बालू रेत की भर में लुढ़के है, खेत में घर से आयी हुई रोटी भी खायी है, दादा जी के देहांत पर 13 दिन तक बैठ कर गरुड़ पुराण भी सुनी है, जिसे स्थानीय बोली में "गरड़ बांचना" कहते है, परदादी के द्वारा नज़...