बचपन की गोधूलि वेला गोधूलि का अर्थ है संध्या के समय जंगल से चरकर आती हुई गाय के खुरो से उड़ती हुई पवित्र धूल परन्तु जिसने इस गोधूलि वेला के केवल शाब्दिक अर्थ को समझा और प्रत्यक्ष अनुभव से आज तक वंचित वह अभागा ही कहलायेगा। इसका कारण यह है की इस शब्द का केवल इतना सा अर्थ नहीं है, इसके अनेक और गहरे अर्थ है। मेरा व्यक्तिगत मानना है की हिंदी साहित्य को तब तक सही अर्थो में नहीं समझा जा सकता जब तक आपने स्वयं ग्रामीण परिवेश निकटता से नहीं देखा है। 1980 से 1990 के बीच जन्मी पीढ़ी उन कुछ भाग्यशाली अंतिम पीढ़ियों में से है जिन्होंने इसका अनुभव किया है। राजस्थान के नीमराना के किले से 10 किलोमीटर दूर स्थित मेरे पैतृक गाँव में बचपन मैंने चूना बनते भी देखा है, ऊँट से बंधी रस्सी पर बैठकर कुए से पानी भी खींचा है, चूल्हे के लिए जंगल से लकड़ी भी चुनी है, बालू रेत की भर में लुढ़के है, खेत में घर से आयी हुई रोटी भी खायी है, दादा जी के देहांत पर 13 दिन तक बैठ कर गरुड़ पुराण भी सुनी है, जिसे स्थानीय बोली में "गरड़ बांचना" कहते है, परदादी के द्वारा नज़...
आने वाली पीढ़ियों को समर्पित