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बचपन की गोधूलि वेला







बचपन की गोधूलि वेला

गोधूलि का अर्थ है संध्या के समय जंगल से चरकर आती हुई गाय के खुरो से उड़ती हुई पवित्र धूल

परन्तु जिसने इस गोधूलि वेला के केवल शाब्दिक अर्थ को समझा और प्रत्यक्ष अनुभव से आज तक वंचित वह अभागा ही कहलायेगा। इसका कारण यह है की इस शब्द का केवल इतना सा अर्थ नहीं है, इसके अनेक और गहरे अर्थ है।

मेरा व्यक्तिगत मानना है की हिंदी साहित्य को तब तक सही अर्थो में नहीं समझा जा सकता जब तक आपने स्वयं ग्रामीण परिवेश निकटता से नहीं देखा है। 1980 से 1990 के बीच जन्मी पीढ़ी उन कुछ भाग्यशाली अंतिम पीढ़ियों में से है जिन्होंने इसका अनुभव किया है। राजस्थान के नीमराना के किले से 10 किलोमीटर दूर स्थित मेरे पैतृक गाँव में बचपन मैंने

चूना बनते भी देखा है,
ऊँट से बंधी रस्सी पर बैठकर कुए से पानी भी खींचा है,
चूल्हे के लिए जंगल से लकड़ी भी चुनी है,
बालू रेत की भर में लुढ़के है,
खेत में घर से आयी हुई रोटी भी खायी है,
दादा जी के देहांत पर 13 दिन तक बैठ कर गरुड़ पुराण भी सुनी है, जिसे स्थानीय बोली में "गरड़ बांचना" कहते है,
परदादी के द्वारा नज़र न लगे तो उनके द्वारा थू-थू की आवाज़ के साथ माथा भी चुमवाया है,
गांव के स्कूल में लकड़ी की तख्ती को मुल्तानी मिटटी से धोया भी है, बारह-खड़ी भी पढ़ी है,
आर्मी से छुट्टी आये पिता यदि स्कूल के सामने से जाते दिख जाते तो कक्षा छोड़ कर उनके पीछे भागे भी है,
मल-त्याग कर मिटटी से हाथ भी साफ़ किये है,
किसी के भी घर में बछड़ा या बछड़ी पैदा होने पर खीस के लिए बाट भी देखी है,
वीरवार को गांव के एक पीर की मज़ार पर बंटने वाले मुट्ठी भर पताशे की मिठास की सप्ताह भर प्रतीक्षा भी की है,
खाने के बाद बर्तन मिटटी से ही साफ़ होते देखे है,
घर की दूकान के गल्ले से सारे 25 पैसे लेकर अगले दिन पिताजी के साथ ठाट से मेला भी घूमे है,
मेले में कुश्ती भी देखि है,
परिवार की शादियों में 20 दिन पहले जाकर सब रीति-रिवाज़ भी देखे है,
शादी के खाने के लिए भट्टी खुदते हुए भी देखा है,
उस पर बनी आलू, कद्दू की सब्ज़ी भी चखी है,
रात में बड़ी बड़ी पीतल की परातो में बड़ो की निगरानी में हाथो से गर्म बूंदी के लाडू (लड्डू) भी बांधे है,
नानाजी के द्वारा पूछ देख कर ऊंटों का इलाज करते देखा है 
ननिहाल में पिताजी के साथ पानी की कुईं पर जेठ के महीने में रात को बाल्टी से पानी खींच कर नहाये है,
चूल्हे पर नानी के हाथ की दाल का स्वाद आज भी ढूंढ रहा हूँ

 और गाय को गोधूलि वेला में धुल उड़ाते हुए घर पर आते भी देखा है।

अब जिसने यह नहीं देखा तो वह भारत को भी कैसे जानेगा। हाँ तो विषय था गोधूलि का!

एक बच्चे को यह सब जादुई सा लगता था जब इतनी सारी गायों रोज़ एक चरवाहे के आगे आगे चल देती थी । दिन भर गोचर में विभिन्न वनस्पति को चरकर जब वापस आती थी तो पूरा सब अपने अपने घरो में जैसे स्वागत की तैयारी में लग जाते थे। माँ कहती ज़रा देख गाय कहाँ पहुंची है तो छत से दूर जंगल की और से उड़ती गोधूलि दीखते ही मैं हम दरवाज़े पर टकटकी लगाकर अपनी गाय को को खोजने लगते। धीरे धीरे गले की घंटियां और निकट आ जाती और हर गाय अपना घर पहचानकर स्वयं प्रवेश कर जाती।
गोधूलि वेला का यह अद्भुत दृश्य वर्षो बाद पुनः देखने को मिला जब मैं हरिद्वार के जंगलो में स्थित श्री कृष्णायन गोरक्षा शाळा गया और वापस लौटती हज़ारो गायो के झुण्ड को देख वही स्मृतियाँ पुनर्जीवित हो उठी।

अब न वह गाँव रहे न वह लोग और न रही गोधूलि क्योंकि भैंस और विदेशी रंगीन भैंस (जर्सी और अन्य विदेशी नस्ले) की भरमार है और उनके पैरो से उड़ने वाली धुल गोधूलि नहीं हो सकती और भैंसधूलि कोई शब्द नहीं है। तो मेरे उपरोक्त कथनानुसार हुए न हम अभागे, जो सुविधाओं में सुख-ढूंढ रहे है जबकि वास्तव में पहले की असुविधा में ही वास्तविक सुख-सुविधा थी।

यही कारण है की गोधूलि शब्द ह्रदय के निकट रहा है और आज उसकी नाम से गोधूलि परिवार की स्थापना करने का अवसर मिला तो इस से उत्कृष्ट नाम नहीं सूझा

- वीरेंद्र की कलम से

टिप्पणियाँ

  1. Ha Maine bi ye sb dekha. Kia or samja h wo din ache the bahut na koi lalach tha na koi hera fari thi sb khus tha ab aane wle wo din.. nahi

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  2. Vaha bhaiya G..

    Aapke pryaasoo me kisi bhi tarha ka sahyog kar sake to mera sobhagya hoga..

    Shubh kumar
    7877871234
    Jaipur Rajasthan

    जवाब देंहटाएं
  3. maine aisa kuch nahin dekha per main apne bachhon ko dikhane ki koshish zaroor kerungi _/\_

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