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भोजन और पत्तल - किस बीमारी में कौन सी पत्तल?

भोजन और पत्तल हमने कभी वेदों का अध्ययन नही किया,हमने कभी गीता पढ़कर उसे अमल में लाने का प्रयास नही किया,हमने योग विद्या को कभी नही अपनाया,हमने आयुर्वेद में कोई अनुसंधान नही किया,हमने संस्कृत भाषा को कोई महत्व नही दिया ऐसी बहुत सी अच्छी और महत्वपूर्ण चीजें है जो हमारे पूर्वज हमारे बुजुर्ग हमे विरासत में दे गए पर हम पाश्चात्य संस्कृति अपनाने में अंधे हो गए हमने धीरे धीरे हमारी संस्कृति को ही छोड़ने का काम किया. अब एक बहुत छोटी सी बात है पर हमने उसे विस्मृत कर दिया हमारी भोजन संस्कृति इस भोजन संस्कृति में बैठकर खाना और उस भोजन को "दोने पत्तल" पर परोसने का बड़ा महत्व था कोई भी मांगलिक कार्य हो उस समय भोजन एक पंक्ति में बैठकर खाया जाता था और वो भोजन पत्तल पर परोसा जाता था जो विभिन्न प्रकार की वनस्पति के पत्तो से निर्मित होती थी. क्या हमने कभी जानने की कोशिश की कि ये भोजन पत्तल पर परोसकर ही क्यो खाया जाता था?नही क्योकि हम उस महत्व को जानते तो देश मे कभी ये "बुफे"जैसी खड़े रहकर भोजन करने की संस्कृति आ ही नही पाती.जैसा कि हम जानते है पत्तले अनेक प्रकार के पेड़ो के पत्तों से बनाई...

पेट में मोम (WAX) जमा कैसे करें?

पेट में मोम (WAX) जमा कैसे करें? यह बहुत आसान है!  Disposable पेपर कप में चाय, पानी दूध आदि आदि प्रतिदिन प्रयोग करके यह आसानी से किया जा सकता है  आइये जानते है कैसे? **************************************************** आखिरकार, आज का युग सफाई पसंद है वो जीवन में हर पहलु में डिस्पोजेबल (Disposable) तकनीक का प्रयोग करता है चाहे वो रिश्ते हो या बर्तन USE and THROW! विशेषकर शादियों में, बड़े बड़े कॉर्पोरेट दफ्तरों में छोटे छोटे ढाबो पर, चाय की दुकान पर, ट्रेन में, बस में और न जाने कहाँ कहाँ सब विदेशियों की तरह डिस्पोजेबल प्रयोग करने लगे है। क्योंकि सब बहुत पढ़े लिखे है कोई गलत काम नहीं करते। बर्तन जूठा भी नहीं करते और यह सोचकर की यह प्लास्टिक का कचरा चन्द्रमा पर चला जायेगा अपनी जीवन शैली में सब कुछ Disposable प्रयोग करने लगे। वैसे लिख तो दिया है की जनहित में जारी लेकिन ऐसे जन का हित करने के मन नहीं है जो जानबूझ कर अपनी आने वाली पीढियों के लिए संस्कारो की नहीं बल्कि दिल्ली जैसे कचरे के पहाड़ और बीमारी से भरे एक समाज की विरासत छोड़ कर जायेगा। कैसे बनता है यह? ...

बच्चो के शरीर से विषैले तत्वों को निकलने का उपाय - अमृत-प्राशनम्

* अमृत-प्राशन म् *- *संस्कृति आर्य गुरुकुलम* और *गोधूलि परिवार* द्वारा चलाये गए स्वर्णप्राशन (आयुर्वेदिक टीकाकरण) आंदोलन की अपार सफलता के पश्चात अब जिन बच्चो को अनजाने में टीके लगा दिए गए है उनके माता पिता के लिए *शुभ समाचार* आयुर्वेद के विभिन्न ग्रंथो में अनेक ऐसी औषधियां बताई गई है जो शरीर में अनेक प्रकार से जानेवाले Toxins को दूर करती है और बच्चो को अनेक प्रकार के रोगों से बचाती है ।  इन औषधियों में महापंचगव्य घृत, मधु, शुद्ध हींग अर्क, सुवर्णरिप्य, गिलोय, पिप्पली इत्यादि... इन सबको उचित मात्रा में शास्त्रीय पद्धति से मिलकर बनाया गया एक सर्वोत्तम औषध है  "अमृत-प्राशन म् " । लाभ: 1) " अमृत-प्राशनम्" के गुण अमृत तुल्य होने से इसके नियमित सेवन से रोग रोग-प्रतिकारक सामर्थ्य बढता है  और बालक तेजस्वी और स्वस्थ रहता है ।  बच्चो के शारीरिक विकास तो भी तेज़ करता है  2)  बालको के शरीर में विविध प्रकार के  विषाक्त पदार्थों   (Toxins) अनेक माध्यमो से जाते है - जैसे टीकाकरण (Vaccinations) से, खेतो में प्रयोग किये जाने वाली दवाइयों से (pesticide...

मुझसे नही स्वयं से पूछे की टीका लगवाए की नही? - वीरेंद्र सिंह

मुझसे नही स्वयं से पूछे की टीका लगवाए की नही? - वीरेंद्र सिंह

(भाग - 2) मांसाहार: कुतर्क एवं भ्रम

(भाग - 2) मांसाहार: कुतर्क एवं भ्रम *************************** कुतर्क 2) क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा? खण्ड़न- अगर एस्किमोज़ मांसाहार बिना नहीं रह सकते तो क्या आप भी शाकाहार उपलब्ध होते हुए एस्किमोज़ का बहाना आगे कर मांसाहार चालू रखेंगे? खूब!! एस्किमोज़ तो वस्त्र के स्थान पर चमड़ा पहते है, आप क्यों नही सदैव उनका वेश धारण किए रहते? अल्लाह नें आर्कटिक में मनुष्य पैदा ही नहीं किये थे,जो उनके लिये वहां पेड-पौधे भी पैदा करते, लोग पलायन कर पहुँच जाय तो क्या कीजियेगा। ईश्वर नें बंजर रेगीस्तान में भी इन्सान पैदा नहीं किए। फ़िर भी स्वार्थी मनुष्य वहाँ भी पहुँच ही गया। यह तो कोई बात नहीं हुई कि दुर्गम क्षेत्र में रहने वालों को शाकाहार उपलब्ध नहीं, इसलिए सभी को उन्ही की आहार शैली अपना लेनी चाहिए।  आपका यह एस्किमोज़ की आहारवृत्ति का बहाना निर्थक है। जिन देशों में शाकाहार उपलब्ध न था, वहां मांसाहार क्षेत्र वातावरण की अपेक्षा से मज़बूरन होगा और इसीलिए उसी वातावरण ...

यह शरीर पूर्वजो का ऋण है - वीरेंद्र सिंह (गोधूलि परिवार)

  यह शरीर पूर्वजो का ऋण है -  वीरेंद्र सिंह  (गोधूलि परिवार)

अभिनंदन के अभिनंदन में पुलवामा के 40 की शहादत भूल न जाना!

तब तक बंद करो यह ढोल नगाड़े! अभिनंदन के अभिनंदन में पुलवामा के 40 की शहादत भूल न जाना 1 के आने की खुशी अच्छी है लेकिन 40 जो कभी न आएंगे उनका क्या? कहने का अर्थ यह कि काम अभी पूरा नहीं हुआ है। आतंकियों के मरने से दुखी पाक ने हमारे देश मे लड़ाकू जहाज़ भेज दिए। और हम उनके एक F16 को मारकर खुश हो रहे है।  दुनिया के इतिहास में पहली बार एक मिग- 21 द्वारा एक F16 को मार गिराने का अद्भुत कार्य अभिनंदन ने किया है। ऐसे कई अभिनंदन और चाहिए और उन्हें सुखोई जैसे विमान देकर भेज दो।  जब तक कि एयर इंडिया के विमान IC 184 को हाइजैक कर उसके यात्रियों की जान के बदले छोड़े गए  मसूद अज़हर  को कफन नसीब न हो जाये।  एयर इंडिया के उस विमान के यात्री क्या चैन से सो पाते होंगे जिनकी जान की कीमत के बदले  आज तक न जाने कितने ही लोग हाफि ज सईद और  मसूद अज़हर  जैसे आतंकी के शैतानी मंसूबो की भेंट चढ़ गए। तब तक बंद करो यह ढोल नगाड़े। वीरेंद्र
क्यो जुड़ना है गोधूली परिवार से?  ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपने अस्तित्व का शोक न हो!