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अगस्त, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

केवल कर्म करना ही हाथ में है

केवल कर्म करना ही हाथ में है! कई बार जीवन में कुछ ऐसा होता है जो उस समय हमें बिल्कुल गलत लगता है। बस छूट गई। कहीं चयन नहीं हुआ। जिस पर भरोसा था, वही छोड़कर चला गया। और हम तुरंत फैसला सुना देते हैं— मेरे साथ गलत हो गया। पर हमें सच में पता है कि गलत क्या हुआ? हम तो केवल उतना देख पा रहे हैं जितना इस समय हमारे सामने है। आगे उस रास्ते पर क्या था, यह हमें कहाँ मालूम? और मज़े की बात यह है कि जिस जीवन पर हम इतना नियंत्रण चाहते हैं, उसमें वास्तव में हमारा नियंत्रण है ही कितना? अपने शरीर को ही देख लीजिए। करोड़ों कोशिकाएँ हर समय अपना काम कर रही हैं। हृदय धड़क रहा है। खून बह रहा है। शरीर के भीतर न जाने कितनी प्रक्रियाएँ चल रही हैं। आप उनमें से कितनी चला रहे हैं? कुछ भी नहीं। थोड़ा बाहर आइए। पृथ्वी घूम रही है। ग्रह अपनी कक्षाओं में चल रहे हैं। सूर्य कब उगेगा, ऋतु कब बदलेगी, वर्षा कब होगी— इनमें से किसी पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं। सूक्ष्मतम कोशिका से लेकर विराट ग्रह-नक्षत्रों तक व्यवस्था हमारे आदेश से नहीं चल रही। फिर भी आदमी को भ्रम यह है कि मेरा पूरा जीवन मेरी योजना के हिसाब से ही चलना चाहिए! यहीं...

NSSM 200: दुनिया की जनसंख्या कम करने की योजना का 1974 का प्रमाण

2019 के लगभग एक परिचित के टेबल पर काँच के नीचे एक डॉक्यूमेंट देखा तो मैंने पूछा कि यह महत्वूर्ण जानकारी ऐसे क्यो छिपा कर रखी है  तो उन्हीने कहा कि इतने वर्षों में आप पहले व्यक्ति हो जिसने इसको समझा है  क्या था वह डॉक्यूमेंट आइए जानते है  यह वो प्रमाण है जो आप किसी को भी देकर कुतर्को का मुंह बंद कर सकते है  हमें बताया गया कि दुनिया की जनसंख्या कम करने की कोई अंतरराष्ट्रीय योजना वगैरह नहीं है। ऐसी बातें करने वाले बस conspiracy theorists हैं। अच्छा जी! फिर 1974 का यह गुप्त दस्तावेज़ NSSM 200 क्या था? पूरा नाम था— National Security Study Memorandum 200 और इसे तैयार करवाने वालों में प्रमुख नाम था Henry Kissinger का। अब आप सोचेंगे अमेरिका की National Security का भारत, Nigeria, Mexico, Brazil जैसे देशों की जनसंख्या से क्या लेना-देना? यही तो मज़ेदार बात है। दस्तावेज़ युद्ध के बारे में नहीं था। मिसाइल के बारे में नहीं था। इसमें चिंता थी कि विकासशील देशों की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। और यदि इन देशों के लोग अधिक सम्पन्न होने लगे… तो क्या होगा? वे अधिक भोजन खाएँगे। अधिक ...

निष्ठा की परीक्षा

 निष्ठा की परीक्षा  शादी हो जाने के बाद दुनिया से सुन्दर लोग गायब नहीं हो जाते।  आपकी पत्नी से अधिक सुन्दर स्त्रियाँ मिलेंगी। आपके पति से अधिक सफल, अधिक पैसे वाले, अधिक आकर्षक पुरुष भी मिलेंगे। इसीलिए विवाह केवल चेहरा, शरीर या पैसा देखकर किया ही नहीं जाना चाहिए। क्योंकि शादी खेल का अंत नहीं है। असल परीक्षा तो उसके बाद शुरू होती है। पुरुष को कोई ऐसी स्त्री मिलेगी जो पत्नी से कम उम्र की है, अधिक सजी-सँवरी है, फिट है, मुस्कुराकर बात करती है… और सबसे बड़ी बात—उसके साथ अभी बिजली का बिल, बच्चों की फीस, गैस सिलेंडर और सुबह की स्कूल बस नहीं जुड़ी। और घर पहुँचोगे तो पत्नी शायद बाल बाँधे, पुराने कपड़ों में, बच्चों पर चिल्लाती हुई मिले। अब तुलना बड़ी आसान लगेगी। बस एक बात याद रखना— जिस स्त्री को तुम बाहर चमकता हुआ देख रहे हो, उसके साथ तुमने जीवन नहीं जिया। और जिस पत्नी को आज थका हुआ देख रहे हो, उसकी उस थकान में तुम्हारा घर भी शामिल है। ठीक यही बात स्त्रियों पर भी लागू होती है। ऑफिस में कोई पुरुष मिलेगा—अच्छा कमाता है, फिट है, ध्यान से बात सुनता है, तारीफ करता है, तुम्हारी हर बात पर ...

समस्या ही बिज़नेस मॉडल है!

हमें बचपन से एक बड़ी प्यारी बात समझाई गई है— व्यवस्थाएँ हमारी समस्याएँ हल करने के लिए बनी हैं। कितनी सुंदर बात है! बस एक छोटी सी दिक्कत है… अगर आपकी समस्या ही किसी की रोजी-रोटी हो, तो वह उसे खत्म क्यों करेगा? 2018 में Goldman Sachs के analysts ने pharmaceutical business को लेकर एक सवाल पूछा था— “Is curing patients a sustainable business model?” मतलब— मरीज को हमेशा के लिए ठीक कर देना क्या फायदे का धंधा है? सवाल थोड़ा निर्दयी लगता है। लेकिन हिसाब बहुत सीधा है। एक गोली खाई। बीमारी खत्म। ग्राहक भी खत्म। लेकिन… सुबह एक गोली। रात एक गोली। हर महीने prescription। हर छह महीने test। फिर अगली appointment। वाह! मरीज भी जीवित। बीमारी भी जीवित। और business भी जीवित। पूरी तरह स्वस्थ आदमी से बीमारी के नाम पर कुछ कमाया नहीं जा सकता और मर चुके आदमी को दवा बेची नहीं जा सकती। इसलिए बाजार के हिसाब से सबसे उपयोगी ग्राहक कौन हुआ? जो मरे भी नहीं… और पूरी तरह ठीक भी न हो। अब नाराज़ डॉक्टरों को पहले ही बता दूँ—बात डॉक्टर की नहीं, उस business incentive की है जिसमें इलाज खत्म होने से revenue भी खत्म हो जाता है। अ...

शायद दुनिया के सबसे बड़े झूठों में से एक यह है

शायद दुनिया के सबसे बड़े झूठों में से एक यह है  कि उम्र के साथ समझदारी अपने-आप आ जाती है। नहीं आती! समय आपको समझदार नहीं बनाता। समय बस यह दिखा देता है कि आपने इतने वर्षों में सीखा कितना है। बहुत से लोग उम्र में बड़े हो जाते हैं, सोच में नहीं। वही गलतियाँ करते रहते हैं। वही आदतें पकड़े रहते हैं। वही फैसले बार-बार दोहराते हैं। और फिर उस दोहराव को नाम दे देते हैं— “अनुभव।” जबकि किसी काम को तीस साल तक करते रहना और उस काम से तीस साल तक सीखते रहना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं। आप किसी गलती को सौ बार दोहरा लें तो वह अनुभव नहीं बन जाती। गलती से सीखना अनुभव है। गलती को दोहराते रहना सिर्फ उम्र बढ़ना है। इसलिए किसी व्यक्ति के सफेद बाल देखकर उसकी समझदारी का अनुमान मत लगाइए। कभी-कभी सफेद बाल केवल इतना बताते हैं कि आदमी बहुत वर्षों से इस दुनिया में है। यह नहीं कि उसने इन वर्षों से कुछ सीखा भी है। उम्र समय बताती है। समझदारी यह बताती है कि उस समय का किया क्या। वीरेन्द्र सिंह की कीबोर्ड रुपी कलम द्वारा  भ्रमित भारतीयों के भ्रम का भ्रमण  VirenderSingh.in Gaudhuli.com

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले | अमर देशभक्ति कविता | नई धुन के साथ | LYRICAL VIDEO

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले | अमर देशभक्ति कविता | नई धुन के साथ  | LYRICAL VIDEO MUSIC BY _ वीरेंद्र सिंह - Virender Singh **“शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा…”** यह अमर देशभक्ति कविता **जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’** की रचना है। स्वतंत्रता, बलिदान, मातृभूमि के प्रति प्रेम और आने वाले स्वाधीन भारत के स्वप्न को व्यक्त करती इन पंक्तियों को इस वीडियो में एक **नई संगीतमय एवं दृश्यात्मक प्रस्तुति** देने का प्रयास किया गया है

“गोमूत्र एक्सपर्ट” कहना अपमान नहीं, प्रशंसा भी हो सकती है!

“गोमूत्र एक्सपर्ट” कहना अपमान नहीं, प्रशंसा भी हो सकती है! प्रियंका गांधी ने शायद व्यंग्य और नकारात्मक भाव से IIT Madras के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि को “गोमूत्र एक्सपर्ट” कहा। लेकिन मुझे इसमें अपमान समझ नहीं आता। यदि कोई वैज्ञानिक हमारी परंपराओं में वर्णित किसी पदार्थ के गुणों को अंधविश्वास मानकर ठुकराने के बजाय वैज्ञानिक कसौटी पर परखने की बात करता है, तो इसमें लज्जा कैसी? गोमूत्र उपयोगी है या नहीं, उसके कौन-से दावे वैज्ञानिक रूप से सही हैं और कौन-से नहीं—इसका निर्णय भी शोध से ही होना चाहिए, उपहास से नहीं। इसलिए “गोमूत्र एक्सपर्ट” शब्द यदि सचमुच वैज्ञानिक अध्ययन और ज्ञान के अर्थ में बोला जाए, तो यह गाली नहीं, योग्यता का परिचय है। मैं तो कहूँगा—जिस दिन पर्याप्त प्रमाणित शोध उनके नाम से हो जाए, वे इसे अपने विजिटिंग कार्ड पर भी गर्व से लिख सकते हैं: Prof. V. Kamakoti Director, IIT Madras …and yes, Gaumutra Expert. 🙂 विज्ञान का काम किसी विषय का मज़ाक उड़ाना नहीं, उसकी जाँच करना है। वीरेन्द्र सिंह की कीबोर्ड रुपी कलम द्वारा  भ्रमित भारतीयों के भ्रम का भ्रमण  VirenderSingh.in

हम भूख से खाते हैं या खाने के लिए भूख बनाते हैं?

हम भूख से खाते हैं या खाने के लिए भूख बनाते हैं? कभी जंगल में किसी मोटे शेर को देखा है? इतना मोटा कि शिकार ही न कर पाए? या कोई पक्षी इतना भारी हो गया हो कि उड़ न सके? प्रकृति में रहने वाले जीव सामान्यतः एक सीधी व्यवस्था में जीते हैं— **भूख लगी → भोजन खोजा → श्रम किया → खाया → रुक गए।** मनुष्य ने यह क्रम बदल दिया। अब हमें भूख लगे तभी हम खाएँ, ऐसा नहीं है। चाय के साथ कुछ चाहिए। तनाव है तो कुछ खा लेते हैं। मन खराब है तो खाते हैं। खुशी है तो खाते हैं। टीवी चल रहा है तो कुछ चबाने को चाहिए। पेट भरा है, लेकिन मिठाई सामने है— खा लेते हैं। यानि भोजन अब केवल भूख का उत्तर नहीं रहा। वह मनोरंजन भी है। पुरस्कार भी। तनाव की दवा भी। बोरियत का इलाज भी। और कई बार लत भी। प्रकृति का क्रम था— **भूख → प्रयास → भोजन → तृप्ति।** हमने बना दिया— **इच्छा → सुविधा → भोजन → फिर इच्छा।** भोजन पाने के लिए अब शरीर को बहुत कम श्रम करना पड़ता है। मोबाइल उठाओ। दो बटन दबाओ। खाना दरवाजे पर। पहले भोजन पाने के लिए शरीर को मेहनत करनी पड़ती थी। आज भोजन से खुद को रोकने के लिए मन को मेहनत करनी पड़ती है। और एक बात और देखिए। जानव...

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक बात धीरे-धीरे समझ आने लगती है

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक बात धीरे-धीरे समझ आने लगती है। आपके पिता भी आखिर एक साधारण इंसान ही थे। उन्हें जितना समझ आता था, जितना वे जानते थे, उसी के आधार पर वे आपके लिए अपनी तरफ से सबसे अच्छा करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कई बार अपनी जरूरतों से पहले आपकी जरूरतों को रखा, क्योंकि वे आपसे बहुत प्रेम करते थे—भले ही उन्होंने उसे कभी ठीक से कहा न हो। उन्होंने अपने कुछ सपने, शायद बहुत से सपने, उन सपनों के लिए छोड़ दिए जो उन्होंने आपके लिए देखे थे। इस दुनिया में शायद वही एक व्यक्ति होता है जो सच में चाहता है कि आप उससे भी आगे निकलें, उससे बेहतर जीवन जिएँ। और शायद इसी कोशिश में वे कई बार आपके साथ कठोर भी रहे होंगे। हर बार न्यायपूर्ण नहीं रहे होंगे। उनसे गलतियाँ भी हुई होंगी। उनसे नाराज़ हो तो ज़्यादा दिन मत रहना  वे भी यह जीवन पहली बार ही जी रहे थे।  वीरेन्द्र सिंह की कीबोर्ड रुपी कलम द्वारा 

सावधान युवाओं! अपना भविष्य मत जलाओ – नारे लगाने वाली भीड़ बनकर मत मरो, अपना दीपक स्वयं बनो

  सावधान युवाओं! अपना भविष्य मत जलाओ – नारे लगाने वाली भीड़ बनकर मत मरो, अपना दीपक स्वयं बनो साथियों  आज आप सबके सामने बहुत भारी मन से कुछ कड़वी, मगर ज़रूरी सच्चाइयाँ रखने जा रहा हूँ। पिछले कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि 16–22 वर्ष के नौजवान, जो अपनी ज़िंदगी का सबसे कीमती समय पढ़ाई, कौशल और करियर बनाने में लगा सकते हैं, वे सोशल मीडिया के कुछ “लाउडस्पीकर क्रांतिकारियों” के पीछे अपना सब कुछ दाँव पर लगा रहे हैं। ये लोग बड़े-बड़े दावे करते हैं— “पढ़ाई बेकार है… सिस्टम गुलाम बना रहा है… अभी क्रांति करो… NWO आ रहा है… माता-पिता नहीं समझते…” और मासूम बच्चे इनकी बातों में आकर घर छोड़ देते हैं, पढ़ाई छोड़ देते हैं और माँ-बाप से बगावत कर लेते हैं। परिणाम? डिप्रेशन, आत्महत्या का प्रयास, बर्बाद करियर और अंत में पछतावा। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं 15 वर्षो से आंदोलनों “क्रांति” के नाम पर केवल अहंकार, स्वार्थ, आपसी साज़िशें और पैसों का खेल चल रहा है, तो बहुत से लोग चुपचाप इनसे अलग हो गए । 1) 1 GB के दिमाग में 10 GB का नकारात्मक डेटा मत ठूँसो दसवीं-बारहवीं का एक बच्चा अभी अपनी ब...

मुफ़्त की आदत केवल जनता को नहीं लगती

  मुफ़्त की आदत केवल जनता को नहीं लगती पहली बार आप किसी को कोई चीज़ मुफ़्त में देते हैं तो उसके मन में आपके प्रति आभार पैदा होता है। दूसरी बार वही चीज़ मिले तो अगली बार उसकी प्रतीक्षा होने लगती है। तीसरी बार वह उसे अपना अधिकार समझने लगता है। चौथी बार अधिकार और पक्का हो जाता है। पाँचवीं बार वह सुविधा आदत बन जाती है। और छठी बार अगर वही चीज़ न मिले तो पहले पाँच बार के लिए धन्यवाद नहीं निकलता। सवाल निकलता है— इस बार क्यों नहीं मिला? यही मुफ्त की सबसे बड़ी समस्या है। धीरे-धीरे पाने वाला भूल जाता है कि जो उसे मुफ्त मिल रहा है, उसकी कीमत कोई न कोई चुका रहा है। अब यही बात राजनीति पर लगाकर देखिए। हमारे नेता अक्सर जनता को समझाते हैं— Freebie Culture देश के लिए अच्छा नहीं है। बिल्कुल सही। मुफ्त की आदत किसी के लिए अच्छी नहीं है। लेकिन फिर एक छोटा-सा सवाल है— यह नियम केवल जनता के लिए है क्या? जरा नेताओं को मिलने वाली सुविधाओं का हिसाब भी देख लेते हैं। एक सामान्य MLA लगभग ₹1.60 लाख महीना salary और allowances का पात्र है। इसके अतिरिक्त उसके Secretary के लिए ₹20,000 महीना और Driver के लिए ₹20,000...

अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते है?

  अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते है? अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते हैं? एक चीज़ मुझे समझ नहीं आती। जब अरबपतियों की संपत्ति पर कर लगाने की बात आती है तो तुरंत कहा जाता है कि उनके पास इतना पैसा होता कहाँ है? मान लो किसी आदमी की संपत्ति 300 अरब डॉलर बताई जा रही है। तो कहा जाएगा कि भाई उसके बैंक में 300 अरब डॉलर थोड़े ही पड़े हैं। उसके पास कंपनी के शेयर हैं। आज शेयर की कीमत इतनी है, कल गिर सकती है। उसने शेयर बेचे भी नहीं हैं। इसलिए यह असली कमाई नहीं है। ठीक है। यह बात मान लेते हैं। लेकिन फिर वही आदमी बैंक के पास जाता है। बैंक से कहता है कि मेरे पास इतने अरब डॉलर के शेयर हैं, इनके बदले मुझे कुछ अरब डॉलर उधार दे दो। और बैंक दे भी देता है। अब यहाँ मुझे थोड़ी दिक्कत होती है। कर देना हो तो शेयर पैसा नहीं हैं। लोन लेना हो तो वही शेयर पूरी संपत्ति हैं। ऐसा कैसे? मतलब सरकार पूछे तो कहेंगे— भाई मेरे पास पैसा कहाँ है? मैंने शेयर बेचे थोड़े ही हैं। और बैंक पूछे तो— देखो मेरे पास 300 अरब डॉलर हैं। 🙂 अब साधारण आदमी को देख लो। उसकी एक लाख रुपये तनख्वाह आई। उससे कोई नहीं पूछता कि आपने यह पैसा खर्च ...

प्रेम का कारण नहीं होता !

  प्रेम का आधार कारण नहीं, साथ निभाना है यदि कोई तुमसे प्रेम करता है और इसलिए तुम भी उससे प्रेम करते हो, तो वह अपनापन है। यदि किसी के रूप को देखकर प्रेम हो जाए, तो वह आकर्षण है। यदि किसी के धन, पद या सुख-सुविधाओं के कारण प्रेम हो, तो वह लाभ की भावना है। यदि किसी के अच्छे स्वभाव और सरल व्यवहार के कारण प्रेम हो, तो वह सम्मान है। लेकिन यदि तुम स्वयं यह न बता सको कि तुम उससे प्रेम क्यों करते हो, यदि उसकी कमियाँ भी तुम्हें उससे दूर न कर सकें, यदि उसकी प्रसन्नता में तुम्हें प्रसन्नता मिले और उसके दुःख में तुम्हारा मन भी भर आए, तो वही सच्चा प्रेम है। क्योंकि सच्चा प्रेम किसी कारण से नहीं, मन के जुड़ाव और साथ निभाने से जन्म लेता है। भारत में एक समय ऐसा था जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह तय करते थे। गाँवों में नाई भी परिवारों को अच्छी तरह जानता था। वह केवल संदेश पहुँचाने वाला नहीं होता था, बल्कि परिवारों को जोड़ने का काम भी करता था। उसके बताए हुए अनेक संबंध जीवन भर चलते थे। उस समय अधिकतर युवक और युवती अपने जीवनसाथी से विवाह के बाद ही परिचित होते थे। वे साथ रहते-रहते एक-दूसरे को समझते थे...

18 वर्ष पहले की एक कार्टून फिल्म जो आज का सच दिखा गई!

  आज किसी भी रेस्तराँ में बैठ जाइए। चार लोगों का परिवार मिलेगा। माँ सामने बैठी है, पिता उसके सामने। दो बच्चे साथ हैं। खाना भी आ चुका है। लेकिन मेज़ पर सबसे ज़्यादा बातचीत किससे हो रही है? मोबाइल से। बेटा रील देख रहा है। पिता समाचार पढ़ रहे हैं। माँ किसी समूह में संदेश भेज रही है। बेटी तस्वीर खींच रही है। चार लोग साथ बैठे हैं, पर चारों की दुनिया अलग-अलग है। यही दृश्य देखकर मुझे अचानक Pixar की फिल्म WALL·E याद आती है। लोग अक्सर कहते हैं कि यह पर्यावरण पर बनी फिल्म है। मुझे हमेशा लगता है कि यह फिल्म कचरे की नहीं, आदतों की कहानी है। फिल्म में पृथ्वी प्लास्टिक से भर जाती है। इंसान पृथ्वी छोड़कर अंतरिक्ष में चला जाता है। वहाँ उसके पास हर सुविधा है। चलने की ज़रूरत नहीं, सोचने की ज़रूरत नहीं, बस एक कुर्सी पर बैठे रहिए और स्क्रीन देखते रहिए। पहली बार जब मैंने यह फिल्म देखी थी, तब लगा था कि यह बहुत दूर के भविष्य की कल्पना है। आज दोबारा देखता हूँ तो लगता है, भविष्य हमारे दरवाज़े पर नहीं, हमारी जेब में रखा हुआ है। फ़र्क बस इतना है कि फिल्म में लोगों के हाथ में बड़ी स्क्रीन थी, हमारे हाथ में ...

पृथ्वी हमारी नहीं, हम पृथ्वी के हैं।

पृथ्वी हमारी नहीं है... अरबों वर्षों तक यह पृथ्वी हमारे बिना भी पूर्ण थी। पहाड़ उठते रहे। नदियाँ अपना मार्ग बनाती रहीं। महासागर गहराते रहे। जंगल साँस लेते रहे। जीवन निरंतर नए रूपों में जन्म लेता रहा। यह सब तब भी हो रहा था, जब मनुष्य का अस्तित्व तक नहीं था। फिर हम आए। और पृथ्वी के अनंत इतिहास के एक क्षण भर में हमने स्वयं को इसका स्वामी घोषित कर दिया। हमने धरती पर सीमाएँ खींच दीं। किसी भूभाग का नाम "देश" रख दिया। नदियों को नक्शों की रेखाओं से बाँट दिया। जंगलों को संपत्ति बना दिया। ज़मीन के टुकड़ों पर अपने नाम लिख दिए। और फिर यह विश्वास भी कर लिया कि किसी कागज़ पर छपा हुआ स्वामित्व ही अंतिम सत्य है। लेकिन... प्रकृति ने उन कागज़ों पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए। ऐसा कोई कानून नहीं जिसे हिमालय मानता हो। ऐसा कोई पासपोर्ट नहीं जिसे महासागर पहचानते हों। ऐसी कोई अदालत नहीं जिसके सामने जंगल हाज़िरी लगाते हों। ऋतुएँ किसी सरकार के आदेश से नहीं बदलतीं। हवा किसी संविधान के अनुसार नहीं बहती। बारिश किसी सीमा-रेखा को देखकर नहीं बरसती। सूरज किसी राष्ट्रध्वज को सलामी देकर नहीं उगता। और मृत्यु... वह ...

क्या Avatar फिल्म कहीं न कहीं ब्रिटिश भारत की याद दिलाती है?

जब मैंने पहली बार 2009 में Avatar देखी थी, तो मुझे यह सिर्फ एक साइंस फिक्शन फिल्म लगी। लेकिन दूसरी बार देखने पर लगा कि यह कहानी सिर्फ एलियंस और दूसरी दुनिया की नहीं है। इसमें औपनिवेशिक शासन (Colonialism) की झलक साफ दिखाई देती है। अगर ब्रिटिश भारत का इतिहास पढ़ा हो, तो कई जगह ऐसा लगता है जैसे कहानी बस ग्रह बदलकर सुना दी गई हो। सबसे पहली बात देखिए। फिल्म में इंसान Pandora पर दोस्ती करने नहीं जाते। वे वहाँ इसलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ Unobtanium नाम का कीमती संसाधन है। अब भारत को याद कीजिए। ईस्ट इंडिया कंपनी भी पहले यही कहकर आई थी कि हम तो सिर्फ व्यापार करने आए हैं। लेकिन धीरे-धीरे व्यापार, राजनीति में बदला… राजनीति, सेना में बदली… और देखते-देखते पूरा देश उनके कब्जे में चला गया। यही वजह है कि Avatar देखते समय RDA Corporation कई लोगों को East India Company जैसी लगती है। ⸻ एक और बात पर ध्यान दीजिए। फिल्म में Na’vi लोगों को बार-बार पिछड़ा, जंगली और असभ्य कहा जाता है। इतिहास में भी अंग्रेज़ अक्सर भारत के बारे में यही कहते थे कि यहाँ के लोग पिछड़े हैं और उन्हें सभ्य बनाने की ज़रूरत है। यह नहीं ...

भारत में पेप्सी-कोला के प्रस्तावित प्रवेश से राष्ट्रीय विवाद | Article about Pepsi Story in India Today 1988 originally in English Translated in Hindi |

15 मार्च 1988, इंडिया टुडे भारत में पेप्सी-कोला के प्रस्तावित प्रवेश से राष्ट्रीय विवाद Click for source पंजाब में मात्र 22 करोड़ रुपये की एक मामूली-सी परियोजना ने राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। पेप्सी-कोला को भारत में प्रवेश की अनुमति दी जाए या नहीं—इस पर छिड़ी तीखी लड़ाई के दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आ गए हैं। नींबू के तेल की एक बूंद लीजिए। उसमें जायफल के तेल, दालचीनी के तेल और सार्सापैरिला की जड़ के तेल की बहुत छोटी-छोटी बूंदें मिलाइए। फिर कैफीन, कैरेमल रंग और फॉस्फोरिक एसिड की अत्यंत सूक्ष्म मात्रा डालिए। इस मिश्रण की एक छोटी-सी बूंद पानी की बोतल में डालकर चार चम्मच चीनी मिलाइए और अच्छी तरह हिलाइए। आपके हाथ में जो तैयार होगा, वह केवल शीतल पेय नहीं—एक राष्ट्रीय विस्फोट होगा। कोला की इस मामूली-सी बोतल ने देश में जितना उबाल पैदा किया है, उतना शायद ही किसी और चीज ने किया हो। पेप्सी-कोला को भारतीय बाजार में आने दिया जाए या नहीं—इस पर बहस जोरदार धमाके के साथ शुरू हुई। पेप्सी का प्रवेश वोल्टास और पंजाब एग्रो-इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन यानी PAIC के साथ साझेदारी में प्रस्तावित...