केवल कर्म करना ही हाथ में है
केवल कर्म करना ही हाथ में है!
कई बार जीवन में कुछ ऐसा होता है जो उस समय हमें बिल्कुल गलत लगता है।
बस छूट गई।
कहीं चयन नहीं हुआ।
जिस पर भरोसा था, वही छोड़कर चला गया।
और हम तुरंत फैसला सुना देते हैं—
मेरे साथ गलत हो गया।
पर हमें सच में पता है कि गलत क्या हुआ?
हम तो केवल उतना देख पा रहे हैं जितना इस समय हमारे सामने है।
आगे उस रास्ते पर क्या था, यह हमें कहाँ मालूम?
और मज़े की बात यह है कि जिस जीवन पर हम इतना नियंत्रण चाहते हैं, उसमें वास्तव में हमारा नियंत्रण है ही कितना?
अपने शरीर को ही देख लीजिए।
करोड़ों कोशिकाएँ हर समय अपना काम कर रही हैं।
हृदय धड़क रहा है।
खून बह रहा है।
शरीर के भीतर न जाने कितनी प्रक्रियाएँ चल रही हैं।
आप उनमें से कितनी चला रहे हैं?
कुछ भी नहीं।
थोड़ा बाहर आइए।
पृथ्वी घूम रही है।
ग्रह अपनी कक्षाओं में चल रहे हैं।
सूर्य कब उगेगा, ऋतु कब बदलेगी, वर्षा कब होगी—
इनमें से किसी पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं।
सूक्ष्मतम कोशिका से लेकर विराट ग्रह-नक्षत्रों तक व्यवस्था हमारे आदेश से नहीं चल रही।
फिर भी आदमी को भ्रम यह है कि मेरा पूरा जीवन मेरी योजना के हिसाब से ही चलना चाहिए!
यहीं शायद ईश्वर के प्रति शरणागति समझ में आती है।
शरणागति का अर्थ हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना नहीं है।
बल्कि ठीक उल्टा है।
जो हमारे हाथ में है, उसे पूरी शक्ति से करना।
और जो हमारे हाथ में नहीं है, उसके लिए अपने आपको जलाते न रहना।
हमारे पास वैसे भी पुरुषार्थ करने के अतिरिक्त दूसरा विकल्प है क्या?
प्रयास हमारा है।
परिणाम पूरी तरह हमारा कभी था ही नहीं।
गीता जी की बात—
“कर्म करो, फल की चिंता मत करो”
हमने इतनी बार सुन ली कि उसे लगभग taken for granted मान लिया।
दीवार पर लिख दिया।
WhatsApp पर भेज दिया।
बच्चों को सुना दिया।
बस अपने जीवन में लागू नहीं किया।
हम कर्म भी करते हैं और साथ में परिणाम का पूरा नक्शा भी बना लेते हैं—
यह करूँगा तो ऐसा होना ही चाहिए।
इस व्यक्ति को प्रेम दिया है तो यह मेरे साथ ही रहेगा।
इतनी मेहनत की है तो नौकरी मुझे ही मिलेगी।
इतनी पूजा की है तो ईश्वर मेरी बात क्यों नहीं मानेंगे?
और जब परिणाम हमारे नक्शे से अलग निकलता है तो सबसे पहले ईश्वर से नाराज़।
यही तो उलटा हिसाब है।
पुरुषार्थ हमारा क्षेत्र है।
परिणाम पर हमारा पूर्ण अधिकार कभी था ही नहीं।
इसलिए कोई दरवाज़ा बंद हो जाए तो हर बार उसे दुर्भाग्य घोषित करने की जल्दी क्यों?
जिस व्यक्ति के जाने पर आज दुख हो रहा है, हो सकता है कल समझ आए कि उसका जाना ही ठीक था।
जिस अवसर के छूटने पर आज क्रोध है, हो सकता है उसी ने किसी बड़ी परेशानी से बचाया हो।
कई बार वर्षों बाद पीछे देखकर ही समझ आता है—
जिस दिन मैं ईश्वर से पूछ रहा था,
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया?”
शायद उसी दिन ईश्वर कह रहे थे—
“अभी तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा… इसलिए।”
वीरेन्द्र की कीबोर्ड रूपी कलम से
भ्रमित भारतीयो के भ्रम का भ्रमण
VirenderSingh.in
Gaudhuli.com

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें