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हमारे ज़माने में!

 वैसे तो सोचकर देखो तो हमारी उम्र भी यह कहने की हो गई कि "हमारे जमाने में ऐसा होता था वैसा होता था" लेकिन सच में बहुत बढ़िया था जो भी था... खुद ही स्कूल जाना पड़ता था क्योंकि साइकिल बस आदि से भेजने की रीत नहीं थी, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे...  उनको किसी बात का डर भी नहीं होता था, * पास/नापास यही हमको मालूम था... % कितने परसेंट नंबर आए? से हमारा कभी भी संबंध ही नहीं था...  ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको ढपोर शंख समझा जा सकता था... किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थी... * कपड़े की थैली में...बस्तों में..और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में... किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी.. ..  * हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर रद्दी पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम... एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था.....  * साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की प...

वैसी दिवाली के तो अब बस किस्से ही सुनाए जाते है!

वैसी दिवाली के तो अब बस किस्से ही सुनाए जाते है  दीपावली का सुंदर स्वरूप जो 30+ के लोगों ने जीया है उसे गुलज़ार साहब ने सुंदर शब्दों में पिरोया है,शुभकामनाओं सहित *अब चूने में नील मिलाकर पुताई का जमाना नहीं रहा। चवन्नी, अठन्नी का जमाना भी नहीं रहा। फिर भी गुलजार साहब की लिखी यह कविता बेमिसाल है* ..... हफ्तों पहले से साफ़-सफाई में जुट जाते हैं चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते हैं अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस पाते हैं दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं   *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....*  दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते हैं  चवन्नी -अठन्नी पटाखों के लिए बचाते हैं सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते हैं सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते हैं  *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....*  बिजली की झालर छत से लटकाते हैं कुछ में मास्टर बल्ब भी लगाते हैं टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते हैं दो-चार बिजली के झटके भी खाते हैं  *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....*  दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते है मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जा...