वैसी दिवाली के तो अब बस किस्से ही सुनाए जाते है!

वैसी दिवाली के तो अब बस किस्से ही सुनाए जाते है 




दीपावली का सुंदर स्वरूप जो 30+ के लोगों ने जीया है उसे गुलज़ार साहब ने सुंदर शब्दों में पिरोया है,शुभकामनाओं सहित

*अब चूने में नील मिलाकर पुताई का जमाना नहीं रहा। चवन्नी, अठन्नी का जमाना भी नहीं रहा। फिर भी गुलजार साहब की लिखी यह कविता बेमिसाल है* .....


हफ्तों पहले से साफ़-सफाई में जुट जाते हैं

चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते हैं

अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस पाते हैं

दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं 

 *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....* 


दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते हैं 

चवन्नी -अठन्नी पटाखों के लिए बचाते हैं

सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते हैं

सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते हैं

 *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....* 


बिजली की झालर छत से लटकाते हैं

कुछ में मास्टर बल्ब भी लगाते हैं

टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते हैं

दो-चार बिजली के झटके भी खाते हैं

 *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....* 


दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते है

मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जाते है

दो दिन तक उन्हें छत की धूप में सुखाते हैं

बार-बार बस गिनते जाते है

 *चलो इस बार दीपावली  घर पे मनाते हैं ....* 


धनतेरस के दिन कटोरदान लाते है

छत के जंगले से कंडील लटकाते हैं

मिठाई के ऊपर लगे काजू-बादाम खाते हैं

प्रसाद की थाली पड़ोस में देने जाते हैं

 *चलो इस बार दीपावली  घर पे मनाते हैं ....* 


अन्नकूट के लिए सब्जियों का ढेर लगाते है 

भैया-दूज के दिन दीदी से आशीर्वाद पाते हैं 

 *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....* 


दिवाली बीत जाने पे दुखी हो जाते हैं 

कुछ न फूटे पटाखों का बारूद जलाते हैं 

घर की छत पे दगे हुए राकेट पाते हैं 

बुझे दीयों को मुंडेर से हटाते हैं 

 *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....* 


बूढ़े माँ-बाप का एकाकीपन मिटाते हैं 

वहीँ पुरानी रौनक फिर से लाते हैं 

सामान से नहीं, समय देकर सम्मान जताते हैं

उनके पुराने सुने किस्से फिर से सुनते जाते हैं 

 *चलो इस बार दीपावली घर पे मनाते हैं ....*

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बिना सरकारी दख़ल के दिवाली मना लेते थे 

कुछ मना नहीं था, मन-माना त्यौहार मनाते थे 

वो दिवाली सच में दिवाली थी 

जिसमे बतासे भी मिठाई से ज़्यादा मज़े दे जाते थे

वैसी दीवाली मनाने का फिर से मन है 

लेकिन उतने से में आनंद लेने वाले लोग आज कम है 


वैसी दिवाली के तो अब बस किस्से ही सुनाए जाते है 

जब केवल त्यौहार में परिवार मिलने नहीं आता था 

बल्कि साथ मिलकर हर दिन त्यौहार की तरह मनाते थे


🙏🙏🙏

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