जीवन बड़ा विचित्र हिसाब रखता है। एक समय था जब आपकी जेब इतनी अनुमति नहीं देती थी कि मनपसंद और अच्छा भोजन खरीद सकूँ। जो सस्ता था, वही खा लिया। समोसा सस्ता है, फल महँगा है—समोसा सही। पराठे से पेट भर रहा है—सूखे मेवे कौन खरीदे? कोल्ड ड्रिंक \ चाय \ बिस्कुट में काम चल रहा है—पोषण का हिसाब बाद में देखेंगे। और शरीर भी जवान था। जो डालो, सह लेता था। मीठा खा लिया। तला हुआ खा लिया। रात को देर से खा लिया। कभी बहुत खाया, कभी भूखे रहे। फिर भी अगले दिन शरीर ऐसे उठ खड़ा होता था जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं। युवा अवस्था की सबसे बड़ी भूल शायद यही है— शरीर बहुत कुछ सह लेता है, इसलिए हम समझ लेते हैं कि उसे कुछ हो ही नहीं रहा। जबकि शरीर भूलता नहीं है। बीस-पच्चीस की उम्र में जो अत्याचार हम उस पर करते हैं, चालीसके बाद वही शरीर धीरे-धीरे उनका हिसाब माँगना शुरू कर देता है। तब पता चलता है— जिस पेट को हम कूड़ेदान समझकर कुछ भी डालते रहे, उसकी भी स्मरणशक्ति थी। जिस नींद को काटकर काम किया, वह भी कहीं लिखी जा रही थी। जिस व्यायाम को कल पर टलते रहे, उसका भी लेखा था। जिस वजन को देखकर कहते रहे—“अभी क्या फर्क पड़ता है”—व...
आने वाली पीढ़ियों को समर्पित