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चालीस के बाद आप बदलते हो या जीवन या दृष्टिकोण?

 


शायद जीवन चालीस के बाद शुरू नहीं होता… पहली बार समझ में आना शुरू होता है

चालीस की उम्र में कोई जादू नहीं होता।

न अचानक बुद्धि खुलती है, न संसार बदल जाता है।

लेकिन यदि आदमी ने पिछले चालीस वर्ष केवल काटे नहीं, थोड़े ध्यान से जिए हैं, तो एक बदलाव अवश्य आने लगता है—

जिसे अब तक बहुत महत्वपूर्ण समझते थे, उसका महत्व अचानक कम होने लगता है।

बीस-पच्चीस की उम्र में लगता है कि जीवन बहुत तेज भाग रहा है और हमें उससे भी तेज भागना है।

कुछ बनना है।

नाम करना है।

अधिक कमना है।

लोग क्या सोचते हैं, यह भी देखना है।

जिस नौकरी में चयन नहीं हुआ, लगता है जीवन बिगड़ गया।

जिस व्यक्ति ने ठुकरा दिया, लगता है हमारे भीतर ही कोई कमी है।

किसी ने सम्मान नहीं दिया तो कई दिन तक वही बात घूमती रहती है।

हर घटना बहुत बड़ी लगती है, क्योंकि उस उम्र में हम अपने बारे में एक पहचान बना रहे होते हैं—मैं कौन हूँ, मेरी क्या कीमत है, लोग मुझे कितना महत्व देते हैं।

और मज़ेदार बात यह है कि सफलता की परिभाषा भी प्रायः हमारी अपनी नहीं होती।

किसी ने बता दिया कि अच्छा पद मिल गया तो सफल।

बड़ा घर हो गया तो सफल।

गाड़ी बदल गई तो सफल।

बैंक में रकम बढ़ गई तो सफल।

लोग प्रभावित हो गए तो सफल।

फिर आदमी तीस-पैंतीस तक इसी हिसाब में दौड़ता रहत है।

और कई बार मंज़िल तक पहुँचकर पहला प्रश्न यही निकलता है—

“बस… इतना ही?”

यहीं शायद चालीस के आसपास जीवन थोड़ा उल्टा पढ़ना शुरू होता है।

जिस पड़ोसी की राय बहुत महत्वपूर्ण लगती थी, अब उतनी नहीं लगती।

जिस पदनाम पर गर्व था, वह केवल पदनाम दिखाई देने लगता है।

जिस गाड़ी को लेकर लगता था कि यही प्रतिष्ठा है, समझ आता है कि चार पहियों से अधिक कुछ नहीं।

और फिर एक कठिन प्रश्न सामने खड़ा होता है—

यदि मैं मेरा पद नहीं हूँ, मेरी संपत्ति नहीं हूँ, लोगों की राय नहीं हूँ… तो फिर मैं हूँ कौन?

यही प्रश्न बहुत लोगों को बेचैन करता है।

किसी को लगता है जीवन में कुछ छूट गया।

कोई अचानक सब बदल देना चाहता है।

कोई अपने ही बनए जीवन से भागने लगता है।

लेकिन हो सकता है समस्या यह न हो कि जीवन बिगड़ रहा है।

हो सकता है पहली बार उसका नकली हिस्सा टूट रहा हो।

मूल विचार में एक बहुत अच्छा रूपक है—

पहले चालीस वर्ष इल्ली (caterpillar) की तरह हैं।

वह बस चल रही है, खा रही है, जी रही है। उसे पता नहीं कि भीतर कुछ और बनने की तैयारी चल रही है।

हमारे बीस और तीस के वर्ष भी कुछ वैसे ही होते हैं।

गलतियाँ।

प्रेम।

टूटना।

काम।

असफलताएँ।

सफलताएँ।

गलत निर्णय।

इनमें से बहुत-सी बातों का अर्थ उसी समय समझ नहीं आता।

लेकिन जीवन सामग्री इकट्ठी कर रहा होता है।

शायद इसलिए चालीस की उम्र का सबसे बड़ा लाभ यह नहीं कि आदमी बहुत समझदार हो गया।

लाभ यह है कि वह इतनी बार गलत हो चुका होता है कि अब हर गलती को प्रलय नहीं समझता।

बीस में एक असफलता चरित्र प्रमाणपत्र लगती है।

चालीस में समझ आता है—

गलती थी।

हो गई।

ठीक करेंगे।

आगे बढ़ेंगे।

इतना ही।

आप पर्याप्त बार गिर चुके होते हैं और हर बार किसी तरह उठ भी गए होते हैं।

तब पहली बार यह भ्रम टूटता है कि जीवन में सब कुछ ठीक ही होना चाहिए।

और इसी उम्र में शरीर भी धीरे से एक और सच्चाई बताना शुरू करता है—

तुम यहाँ स्थायी रूप से नहीं आए हो।

युवावस्था में मृत्यु एक समाचार होती है।

किसी और के साथ होने वाली घटना।

चालीस के आसपास माता-पिता बूढ़े दिखाई देने लगते हैं।

किसी पुराने परिचित के जाने का समाचार आता है।

अपने शरीर में भी परिवर्तन दिखाई देते हैं।

और पहली बार मृत्यु कोई दार्शनिक विषय नहीं रहती।

वह व्यक्तिगत हो जाती है।

यहीं से एक बहुत जरूरी प्रश्न पैदा होता है—

जितना समय बचा है, उसे आखिर खर्च कहाँ करना है?

और यदि यह प्रश्न भीतर सच में उतर जाए तो बहुत-सी बकवास अपने आप छोटी होने लगती है।

किसने बुलाया, किसने नहीं बुलाया।

किसने प्रशंसा की, किसने नहीं की।

पड़ोसी क्यासोचता है।

लोग मुझे सफल मानते हैं या नहीं।

एक दिन आँख बंद होनी है तो आखिर कितना जीवन दूसरों को प्रभावित करने में खर्च करना है?

इसका अर्थ यह नहीं कि चालीस के बाद नौकरी छोड़ दो, पहाड़ पर चले जाओ और संसार त्याग दो।

बात इतनी नाटकीय नहीं है।

बात सिर्फ इतनी है—

जो कर रहे हो, यह देखो कि वास्तव में करना भी चाहते हो या केवल करते चले आ रहे हो।

मूल कथा में एक व्यक्ति का उदाहरण है जिसने अपनी पूरी युवावस्था बैंक में ऊपर चढ़ने में लगा दी।

सत्तर-सत्तर घंटे काम।

बच्चों के जन्मदिन छूटे।

स्वास्थ्य गया।

घर का सुख गया।

फिर बयालीस की उम्र में हृदयाघात हुआ।

अस्पताल के बिस्तर पर पहली बार समझ आया—

वह जिस सफलता के पीछे भाग रहा था, उसे वह स्वयं चाहता ही नहीं था।

स्वस्थ होने के बाद उसने नौकरी छोड़ दी और बच्चों को संगीत सिखाना शुरू किया—वही काम जो वह हमेशा करना चाहता था।

मुझे इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात नौकरी छोड़ना नहीं लगी।

महत्वपूर्ण बात यह लगी कि—

हममें से कितने लोग वह जीवन जी रहे हैं जिसे हमने स्वयं चुना है, और कितने वह जिसे समाज ने हमारे हाथ में पकड़ा दिया?

चालीस के बाद शायद हाथ थोड़ा खुलना शुरू होता है।

युवावस्था में मुट्ठी बंद रहती है—

और चाहिए।

और पैसा।

और मान।

और स्वीकृति।

और नियंत्रण।

फिर धीरे-धीरे समझ आता है कि जीवन पानी के समान है।

जितना जोर से पकड़ोगे, उतना निकलता जाएगा।

थोड़ा सहज होकर पकड़ो तो शायद कुछ बच भी जाए।

और यही वह उम्र है जहाँ हमारे यहाँ कही जाने वाली एक बात भी अधिक समझ आने लगती है—

कर्म करते रहो, हर परिणाम को पकड़कर मत बैठो।

क्योंकि जीवन ने अब तक पर्याप्त प्रमाण दे दिए होते हैं कि हमारे नियंत्रण की सीमा बहुत छोटी है।

हम योजना बना सकते हैं।

पुरुषार्थ कर सकते हैं।

निर्णय ले सकते हैं।

लेकिन परिणम का पूरा स्वामित्व हमारे पास कभी था ही नहीं।

और शायद इसी स्वीकार में एक विचित्र-सी स्वतंत्रता है।

अब हर किसी को प्रसन्न करना आवश्यक नहीं।

हर जगह स्वयं को सिद्ध करना आवश्यक नहीं।

हर बहस जीतना आवश्यक नहीं।

हर व्यक्ति से अपनी कीमत मनवाना आवश्यक नहीं।

जो आपको वास्तव में प्रेम करते हैं, उन्हें आपकी उपलब्धियों की सूची की आवश्यकता नहीं।

और जिन्हें आप पसंद नहीं, उनके सामने पूरा जीवन प्रमाण देते रहिए—फिर भी पर्याप्त नहीं होगा।

मूल विचार इसे बहुत सुंदर ढंग से कहता है—

पहला आधा जीवन अहं बनाने में जाता है।

दूसरा आधा जीवन यह समझने में कि वह पूरा सत्य नहीं था।

पहले आधे में हम “कोई” बनने के लिए भागते हैं।

दूसरे आधे में समझ आता है कि कुछ प्रमाणित किए बिना भी हम हैं।

पहले जीवन को बहुत गंभीरता से लेते हैं।

फिर समझ आता है कि यह सब एक सुंदर, विचित्र और अस्थायी नृत्य है।

इसलिए मुझे “जीवन चालीस के बाद आरम्भ होता है” वाक्य थोड़ा अधूरा लगता है।

जीवन तो पहले भी चल रहा था।

अपितु खूब चल रहा था।

चालीस के बाद बस शायद पहली बार समझ आता है कि—

अब तक हम जीवन जी कम रहे थे, जीवन की तैयारी अधिक कर रहे थे।

और फिर एक दिन लगता है—

जिस शान्ति और प्रसन्नता को भविष्य में खोज रहे थे, वह कोई पुरस्कार नहीं था जो गंतव्य पर रखा है।

वह रास्ते में ही थी।

हम ही बहुत जल्दी में थे।

शायद चलीस के बाद आदमी पहली बार यह अनुमति स्वयं को देता है—

अब जैसा हूँ, वैसा होकर भी जी सकता हूँ।

और संभव है असली जीवन वहीं से शुरू हो।

वीरेन्द्र की कीबोर्ड रूपी कलम से
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