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भाग 2: आज की नारी — पढ़ी-लिखी गांधारी (Junk Food हिंदी में कूड़ा भोजन)

  आज की नारी — पढ़ी-लिखी गांधारी भाग 2 — Junk का अर्थ भी पता है... फिर भी बच्चे को खिला रही है आज की माँ अनपढ़ नहीं है। साक्षर है लेकिन शिक्षित नहीं  उसे पता है कि Junk Food कोई स्वास्थ्यवर्धक भोजन नहीं है। वह अंग्रेज़ी भी समझती है, Google भी चला लेती है, Instagram पर हेल्थ अच्छे रखें वाली reels भी देखती है और बच्चे को कौन-सा स्कूल दिलाना है इस पर तीन महीने शोध भी कर सकती है। और Junk का अर्थ भी जानती है कूड़ा। कचरा। ऐसी वस्तु जिसका वास्तविक मूल्य बहुत कम हो। अब विडंबना देखिए। जिस भोजन के नाम में ही दुनिया ने चेतावनी लिख रखी है, वही हम अपने बच्चों को प्यार से खिला रहे हैं। कभी-कभी तो लगता है— पढ़ी-लिखी होकर भी नहीं, शायद पढ़ी-लिखी होने के कारण ही खिला रहे हैं। क्योंकि अब घर की बनी चीज़ साधारण लगने लगी है और चमकीला पैकेट आधुनिक। बच्चा रोया—पैकेट खोल दो। विद्यालय जाना है—बिस्किट रख दो, और थोड़ा आधुनिक दिखना हो तो उसे कुकीज़ कह दो। बाज़ार निकले—चिप्स पकड़ा दो। लंबी यात्रा है—कुछ ताड़ के तेल से लदे पैकेटबंद नाश्ते रख लो। जन्मदिन है—केक, कोला, पैकेट वाला रस और इतनी रंग-बिरंगी ची...

चालीस के बाद आप बदलते हो या जीवन या दृष्टिकोण?

  शायद जीवन चालीस के बाद शुरू नहीं होता… पहली बार समझ में आना शुरू होता है चालीस की उम्र में कोई जादू नहीं होता। न अचानक बुद्धि खुलती है, न संसार बदल जाता है। लेकिन यदि आदमी ने पिछले चालीस वर्ष केवल काटे नहीं, थोड़े ध्यान से जिए हैं, तो एक बदलाव अवश्य आने लगता है— जिसे अब तक बहुत महत्वपूर्ण समझते थे, उसका महत्व अचानक कम होने लगता है। बीस-पच्चीस की उम्र में लगता है कि जीवन बहुत तेज भाग रहा है और हमें उससे भी तेज भागना है। कुछ बनना है। नाम करना है। अधिक कमना है। लोग क्या सोचते हैं, यह भी देखना है। जिस नौकरी में चयन नहीं हुआ, लगता है जीवन बिगड़ गया। जिस व्यक्ति ने ठुकरा दिया, लगता है हमारे भीतर ही कोई कमी है। किसी ने सम्मान नहीं दिया तो कई दिन तक वही बात घूमती रहती है। हर घटना बहुत बड़ी लगती है, क्योंकि उस उम्र में हम अपने बारे में एक पहचान बना रहे होते हैं—मैं कौन हूँ, मेरी क्या कीमत है, लोग मुझे कितना महत्व देते हैं। और मज़ेदार बात यह है कि सफलता की परिभाषा भी प्रायः हमारी अपनी नहीं होती। किसी ने बता दिया कि अच्छा पद मिल गया तो सफल। बड़ा घर हो गया तो सफल। गाड़ी बदल गई तो सफल। बैंक म...

साधारण ऋतु नहीं माता पिता के जीवन का वसंत हैं बचपन!

  बचपन की छोटी-सी ऋतु बच्चों का बचपन बड़ा विचित्र होता है। जब चल रहा होता है तो लगता है कि बहुत लंबा है। घर में खिलौने बिखरे हैं। हर थोड़ी देर में—“पापा सुनो ना…” “मम्मी देखो ना…” खाना नहीं खाना। सोना नहीं है। सौ प्रश्न पूछने हैं। और हम सोचते हैं— थोड़ा बड़ा हो जाए तो कुछ चैन मिले। मिलेगा। लेकिन शायद तब पता चलेगा कि जिस शोर से चैन माँग रहे थे, वही घर की सबसे सुंदर ध्वनि थी। बच्चे हमारे बच्चे पूरे जीवन रहते हैं, लेकिन बच्चे बनकर बहुत थोड़े वर्ष रहते हैं। एक दिन खिलौने कम होने लगेंगे। फिर गोद में बैठना बंद। फिर उंगली पकड़कर चलना बंद। फिर विद्यालय के द्वार पर कहेगा— “आप यहीं छोड़ दो, मैं चला जाऊँगा।” और कुछ वर्षों बाद— “आपको आने की आवश्यकता नहीं है।” यह सब किसी घोषणा के साथ नहीं होता। बस धीरे-धीरे होता है। और जब तक हमें पता चलता है कि बचपन जा रहा है, तब तक वह काफी दूर निकल चुका होता है। लेकिन हमें उसे बड़ा करने की इतनी जल्दी क्यों है? आज के माता-पिता को देखकर कई बार लगता है कि हम माता-पिता कम और फल के व्यापारी अधिक हो गए हैं। कच्चा फल सामने रखा है और चिंता यह है कि जल्दी पक क्यों नहीं...

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक बात धीरे-धीरे समझ आने लगती है

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक बात धीरे-धीरे समझ आने लगती है। आपके पिता भी आखिर एक साधारण इंसान ही थे। उन्हें जितना समझ आता था, जितना वे जानते थे, उसी के आधार पर वे आपके लिए अपनी तरफ से सबसे अच्छा करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कई बार अपनी जरूरतों से पहले आपकी जरूरतों को रखा, क्योंकि वे आपसे बहुत प्रेम करते थे—भले ही उन्होंने उसे कभी ठीक से कहा न हो। उन्होंने अपने कुछ सपने, शायद बहुत से सपने, उन सपनों के लिए छोड़ दिए जो उन्होंने आपके लिए देखे थे। इस दुनिया में शायद वही एक व्यक्ति होता है जो सच में चाहता है कि आप उससे भी आगे निकलें, उससे बेहतर जीवन जिएँ। और शायद इसी कोशिश में वे कई बार आपके साथ कठोर भी रहे होंगे। हर बार न्यायपूर्ण नहीं रहे होंगे। उनसे गलतियाँ भी हुई होंगी। उनसे नाराज़ हो तो ज़्यादा दिन मत रहना  वे भी यह जीवन पहली बार ही जी रहे थे।  वीरेन्द्र सिंह की कीबोर्ड रुपी कलम द्वारा