जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक बात धीरे-धीरे समझ आने लगती है




जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक बात धीरे-धीरे समझ आने लगती है।

आपके पिता भी आखिर एक साधारण इंसान ही थे। उन्हें जितना समझ आता था, जितना वे जानते थे, उसी के आधार पर वे आपके लिए अपनी तरफ से सबसे अच्छा करने की कोशिश कर रहे थे।

उन्होंने कई बार अपनी जरूरतों से पहले आपकी जरूरतों को रखा, क्योंकि वे आपसे बहुत प्रेम करते थे—भले ही उन्होंने उसे कभी ठीक से कहा न हो।

उन्होंने अपने कुछ सपने, शायद बहुत से सपने, उन सपनों के लिए छोड़ दिए जो उन्होंने आपके लिए देखे थे।

इस दुनिया में शायद वही एक व्यक्ति होता है जो सच में चाहता है कि आप उससे भी आगे निकलें, उससे बेहतर जीवन जिएँ।

और शायद इसी कोशिश में वे कई बार आपके साथ कठोर भी रहे होंगे। हर बार न्यायपूर्ण नहीं रहे होंगे। उनसे गलतियाँ भी हुई होंगी।

उनसे नाराज़ हो तो ज़्यादा दिन मत रहना 

वे भी यह जीवन पहली बार ही जी रहे थे। 


वीरेन्द्र सिंह की कीबोर्ड रुपी कलम द्वारा 

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