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पृथ्वी हमारी नहीं, हम पृथ्वी के हैं।

पृथ्वी हमारी नहीं है... अरबों वर्षों तक यह पृथ्वी हमारे बिना भी पूर्ण थी। पहाड़ उठते रहे। नदियाँ अपना मार्ग बनाती रहीं। महासागर गहराते रहे। जंगल साँस लेते रहे। जीवन निरंतर नए रूपों में जन्म लेता रहा। यह सब तब भी हो रहा था, जब मनुष्य का अस्तित्व तक नहीं था। फिर हम आए। और पृथ्वी के अनंत इतिहास के एक क्षण भर में हमने स्वयं को इसका स्वामी घोषित कर दिया। हमने धरती पर सीमाएँ खींच दीं। किसी भूभाग का नाम "देश" रख दिया। नदियों को नक्शों की रेखाओं से बाँट दिया। जंगलों को संपत्ति बना दिया। ज़मीन के टुकड़ों पर अपने नाम लिख दिए। और फिर यह विश्वास भी कर लिया कि किसी कागज़ पर छपा हुआ स्वामित्व ही अंतिम सत्य है। लेकिन... प्रकृति ने उन कागज़ों पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए। ऐसा कोई कानून नहीं जिसे हिमालय मानता हो। ऐसा कोई पासपोर्ट नहीं जिसे महासागर पहचानते हों। ऐसी कोई अदालत नहीं जिसके सामने जंगल हाज़िरी लगाते हों। ऋतुएँ किसी सरकार के आदेश से नहीं बदलतीं। हवा किसी संविधान के अनुसार नहीं बहती। बारिश किसी सीमा-रेखा को देखकर नहीं बरसती। सूरज किसी राष्ट्रध्वज को सलामी देकर नहीं उगता। और मृत्यु... वह ...

मानवजाति का उपहास करती प्रकृति माँ! / Mankind's mistakes & Nature Enjoys!

मानवजाति का उपहास करती प्रकृति माँ!  मानव जगत के षडयंत्रो में जीवजगत का आनंद छुपा है  एक बात सुनी थी की यदि पृथ्वी से मधुमक्खी विलुप्त हो जाये तो मानवजाती 50 वर्ष में विलुप्त हो जाएगी  और यदि मनुष्य विलुप्त हो जाये तो पूरी पृथ्वी 50 वर्ष में विषमुक्त हो जाएगी  आज मनुष्यजाति द्वारा किये गए कोरोना के षडयंत्र का आनंद प्रकृति ले रही है  जहाँ मनुष्यो के 3 दिन की अनुपस्थिति में पूरे देश में विभिन्न शहरो की सड़को पर वन्य जीव आनंद से विचरण कर रहे है।  इन निरीह प्राणियों को क्या पता की इन कंक्रीट के जंगल उनके योग्य नहीं है  हे गोमाता की ही स्वरूपा नीलगाय अभी कुछ दिन बाद देखना यह मनुष्य तुमको कानून की और से मिली खुली आज्ञा के बिना किसी दया के गोली मार देगा।   हे पक्षियों! कुछ दिन बाद देखना जब यह सब अपने घर की क़ैद से छूटेंगे तो फिर से मांसाहार करने को इनकी लार टपकेगी  घर का खाना से तंग आये हुए फिर से भूखे सांड की तरह सड़कछाप और बाज़ारू खाने की ओर लपकेगा या ऑनलाइन आर्डर करेगा  फिर से अंतराष्ट्रीय पिज़्ज़ा बर्गर खाकर अपनी ...