पृथ्वी हमारी नहीं, हम पृथ्वी के हैं।
पृथ्वी हमारी नहीं है...
अरबों वर्षों तक यह पृथ्वी हमारे बिना भी पूर्ण थी।
पहाड़ उठते रहे।
नदियाँ अपना मार्ग बनाती रहीं।
महासागर गहराते रहे।
जंगल साँस लेते रहे।
जीवन निरंतर नए रूपों में जन्म लेता रहा।
यह सब तब भी हो रहा था, जब मनुष्य का अस्तित्व तक नहीं था।
फिर हम आए।
और पृथ्वी के अनंत इतिहास के एक क्षण भर में हमने स्वयं को इसका स्वामी घोषित कर दिया।
हमने धरती पर सीमाएँ खींच दीं।
किसी भूभाग का नाम "देश" रख दिया।
नदियों को नक्शों की रेखाओं से बाँट दिया।
जंगलों को संपत्ति बना दिया।
ज़मीन के टुकड़ों पर अपने नाम लिख दिए।
और फिर यह विश्वास भी कर लिया कि किसी कागज़ पर छपा हुआ स्वामित्व ही अंतिम सत्य है।
लेकिन...
प्रकृति ने उन कागज़ों पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए।
ऐसा कोई कानून नहीं जिसे हिमालय मानता हो।
ऐसा कोई पासपोर्ट नहीं जिसे महासागर पहचानते हों।
ऐसी कोई अदालत नहीं जिसके सामने जंगल हाज़िरी लगाते हों।
ऋतुएँ किसी सरकार के आदेश से नहीं बदलतीं।
हवा किसी संविधान के अनुसार नहीं बहती।
बारिश किसी सीमा-रेखा को देखकर नहीं बरसती।
सूरज किसी राष्ट्रध्वज को सलामी देकर नहीं उगता।
और मृत्यु...
वह कभी यह नहीं पूछती कि जिस मिट्टी पर तुम खड़े थे, उसका मालिक कौन था।
जिस धरती पर आज तुम गर्व से कहते हो—
"यह मेरी ज़मीन है।"
एक दिन वही धरती बिना अनुमति माँगे तुम्हें अपने भीतर समा लेगी।
यही वह सत्य है जिससे मनुष्य सबसे अधिक भागता है।
हम पृथ्वी के मालिक नहीं हैं।
हम उसके उत्तराधिकारी भी नहीं हैं।
हम तो बस कुछ समय के लिए आए हुए यात्री हैं।
हमारी हर साँस उन वृक्षों की देन है जिन्हें हमने नहीं लगाया।
हमारे शरीर की हर बूँद उस जल से बनी है जिसे हमने नहीं बनाया।
हमारे भोजन का हर दाना उस मिट्टी से आया है जिसे हम नियंत्रित नहीं कर सकते।
और हर सूर्योदय हमें यह याद दिलाता है कि ब्रह्मांड अब भी हमारे आदेश से नहीं चलता।
मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह नहीं थी कि उसने शहर बसाए...
सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने स्वयं को प्रकृति से बड़ा समझ लिया।
जिस दिन हम यह मान बैठे कि हमने प्रकृति को जीत लिया है...
उसी दिन हमने उसका सम्मान करना छोड़ दिया।
और इतिहास गवाह है—
जिस सभ्यता ने प्रकृति का सम्मान खोया,
उसने अंततः अपना अस्तित्व भी खो दिया।
क्योंकि अंत में सत्य केवल एक है—
पृथ्वी हमारी नहीं है।
हम पृथ्वी के हैं।
हम आए हैं...
कुछ समय जीने के लिए,
कुछ सीखने के लिए,
कुछ लौटाने के लिए।
स्वामित्व जताने के लिए नहीं।
जिस दिन मानवता इस सरल सत्य को फिर से समझ लेगी,
उसी दिन उसका भविष्य बदलना शुरू होगा।
और जिस दिन वह इसे पूरी तरह भूल जाएगी...
उस दिन प्रकृति को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होगी।
वह केवल अपना काम करती रहेगी—
और इतिहास एक बार फिर किसी नई सभ्यता से शुरू होगा।

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