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मुफ़्त की आदत केवल जनता को नहीं लगती

 




मुफ़्त की आदत केवल जनता को नहीं लगती

पहली बार आप किसी को कोई चीज़ मुफ़्त में देते हैं तो उसके मन में आपके प्रति आभार पैदा होता है।

दूसरी बार वही चीज़ मिले तो अगली बार उसकी प्रतीक्षा होने लगती है।

तीसरी बार वह उसे अपना अधिकार समझने लगता है।

चौथी बार अधिकार और पक्का हो जाता है।

पाँचवीं बार वह सुविधा आदत बन जाती है।

और छठी बार अगर वही चीज़ न मिले तो पहले पाँच बार के लिए धन्यवाद नहीं निकलता।

सवाल निकलता है—

इस बार क्यों नहीं मिला?

यही मुफ्त की सबसे बड़ी समस्या है।

धीरे-धीरे पाने वाला भूल जाता है कि जो उसे मुफ्त मिल रहा है, उसकी कीमत कोई न कोई चुका रहा है।

अब यही बात राजनीति पर लगाकर देखिए।

हमारे नेता अक्सर जनता को समझाते हैं—

Freebie Culture देश के लिए अच्छा नहीं है।

बिल्कुल सही।

मुफ्त की आदत किसी के लिए अच्छी नहीं है।

लेकिन फिर एक छोटा-सा सवाल है—

यह नियम केवल जनता के लिए है क्या?

जरा नेताओं को मिलने वाली सुविधाओं का हिसाब भी देख लेते हैं।

एक सामान्य MLA लगभग ₹1.60 लाख महीना salary और allowances का पात्र है।

इसके अतिरिक्त उसके Secretary के लिए ₹20,000 महीना और Driver के लिए ₹20,000 महीना अलग से सरकार देती है।

और अब सबसे रोचक बात—

विधानसभा की 2026 की अपनी handbook में MLA के लिए ₹20 लाख प्रति वर्ष Petty Grant भी दर्ज है। यात्रा और अन्य सुविधाएँ अलग।

अब MP पर आइए।

एक सांसद को—

₹1.24 लाख वेतन
₹87,000 constituency allowance
₹75,000 office expense allowance

अर्थात कुल ₹2.86 लाख प्रति माह के निर्धारित वेतन और भत्ते।

ऊपर से संसद या समिति के काम के दौरान ₹2,500 प्रतिदिन daily allowance अलग। (Digital Sansad)

और बात यहीं समाप्त नहीं होती।

एक MP को साल में 34 हवाई यात्राओं की सुविधा है।

अपने कार्यकाल में AC First Class/Executive Class का railway pass है।

दिल्ली में flat या hostel accommodation licence fee के बिना मिल सकता है।

Telephone, mobile और internet जैसी सुविधाएँ अलग। (Digital Sansad)

अब Cabinet Minister को देखिए।

उसे MP के समान ₹1.24 लाख salary और ₹87,000 constituency allowance, उसके ऊपर Cabinet Minister के लिए ₹2,000 sumptuary allowance मिलता है।

अर्थात करीब ₹2.13 लाख का fixed monthly structure, daily allowance अलग।

साथ में बिना किराये का furnished सरकारी घर

उस घर की maintenance का खर्च भी सरकार का।

कानून में maintenance की परिभाषा में बिजली और पानी तक शामिल हैं।

Official travel अलग।

और साल में अधिकतम 48 eligible fares की व्यवस्था भी है। (Ministry of Home Affairs)

अब फिर मूल सवाल पर आते हैं।

अगर किसी गरीब परिवार को कुछ किलो राशन मिला—

Freebie.

कुछ यूनिट बिजली मिली—

Freebie.

महिला को कुछ आर्थिक सहायता मिली—

Freebie.

लेकिन नेता को वेतन के ऊपर भत्ते, यात्रा, स्टाफ, घर, फोन और दूसरी सुविधाएँ मिलीं तो—

Facility.

वाह!

नाम बदलते ही मुफ्त चीज़ मुफ्त नहीं रही?

अब इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि सांसद या विधायक को काम करने के लिए कार्यालय, कर्मचारी, यात्रा या आवास नहीं मिलना चाहिए।

मिलना चाहिए।

लेकिन फिर जनता को भी हर सहायता के लिए “मुफ्तखोर” कहना बंद कीजिए।

क्योंकि सिद्धांत अगर है तो दोनों पर लगेगा।

और एक बात और सोचिए।

नेता को मिलने वाली कोई भी सुविधा वास्तव में मुफ्त नहीं है।

उसका बिल सरकार भरती है।

और सरकार कहाँ से भरती है?

आपसे।

आप साबुन खरीदते हैं—कर देते हैं।

पेट्रोल भरवाते हैं—कर देते हैं।

कमाते हैं—कर देते हैं।

व्यापार करते हैं—कर देते हैं।

घर खरीदते हैं—कर देते हैं।

और फिर इसी पैसे से व्यवस्था चलती है।

इसलिए असली शब्द “मुफ्त” शायद है ही गलत।

मुफ्त केवल पाने वाले के लिए होता है।
देने वाला कहीं न कहीं मौजूद होता है।

और राजनीति में वह देने वाला अधिकतर—

करदाता होता है।

तो अगली बार जब कोई नेता मंच से Freebie Culture पर ज्ञान दे...

तो उससे एक प्रश्न जरूर पूछिए—

सर, शुरुआत जनता से ही क्यों?

एक बार अपने वेतन, भत्तों, यात्राओं, घर, स्टाफ और बाकी सुविधाओं की सूची भी सामने रख दीजिए।

फिर दोनों का हिसाब साथ करते हैं।

क्योंकि मुफ़्त की आदत यदि गलत है—

तो गरीब की भी गलत है,

अमीर की भी गलत है,

और सत्ता की भी।

मुफ़्त की चीज़ पाँच बार मिलने के बाद अधिकार लगने लगती है।

बस अंतर इतना है—

जनता के मुफ्त को हम Freebie कहते हैं।

और सत्ता के मुफ्त को—

Privilege.

वीरेन्द्र की कीबोर्ड रूपी कलम से
VirenderSingh.in

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