अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते है?

 



अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते है?


अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते हैं?

एक चीज़ मुझे समझ नहीं आती।

जब अरबपतियों की संपत्ति पर कर लगाने की बात आती है तो तुरंत कहा जाता है कि उनके पास इतना पैसा होता कहाँ है?

मान लो किसी आदमी की संपत्ति 300 अरब डॉलर बताई जा रही है।

तो कहा जाएगा कि भाई उसके बैंक में 300 अरब डॉलर थोड़े ही पड़े हैं। उसके पास कंपनी के शेयर हैं। आज शेयर की कीमत इतनी है, कल गिर सकती है। उसने शेयर बेचे भी नहीं हैं।

इसलिए यह असली कमाई नहीं है।

ठीक है।

यह बात मान लेते हैं।

लेकिन फिर वही आदमी बैंक के पास जाता है।

बैंक से कहता है कि मेरे पास इतने अरब डॉलर के शेयर हैं, इनके बदले मुझे कुछ अरब डॉलर उधार दे दो।

और बैंक दे भी देता है।

अब यहाँ मुझे थोड़ी दिक्कत होती है।

कर देना हो तो शेयर पैसा नहीं हैं।

लोन लेना हो तो वही शेयर पूरी संपत्ति हैं।

ऐसा कैसे?

मतलब सरकार पूछे तो कहेंगे—

भाई मेरे पास पैसा कहाँ है? मैंने शेयर बेचे थोड़े ही हैं।

और बैंक पूछे तो—

देखो मेरे पास 300 अरब डॉलर हैं।

🙂

अब साधारण आदमी को देख लो।

उसकी एक लाख रुपये तनख्वाह आई।

उससे कोई नहीं पूछता कि आपने यह पैसा खर्च किया है या नहीं।

पैसा आया मतलब आय हुई।

नियम के अनुसार कर लगेगा।

वह यह नहीं कह सकता कि पैसा तो अभी बैंक में पड़ा है, मैंने इस्तेमाल नहीं किया, इसलिए फिलहाल इसे आय मत मानो।

लेकिन बहुत अमीर आदमी का खेल अलग है।

उसकी संपत्ति शेयर में बढ़ती जाती है।

उसने शेयर नहीं बेचे, इसलिए उस बढ़ी हुई कीमत पर उसी तरह तत्काल कर नहीं लगा जैसे वेतन पर लगता है।

यहाँ तक भी ठीक।

पर उसे पैसा चाहिए तो शेयर बेचने की जरूरत क्या है?

उन्हीं शेयरों के बदले बैंक से लोन उठा लो।

अब पैसा हाथ में आ गया।

घर खरीदो।

यॉट खरीदो।

दूसरी कंपनी में पैसा लगाओ।

जो करना है करो।

लेकिन वह पैसा आय नहीं कहलाता।

वह ऋण है।

और ऋण लेने पर केवल इस कारण आयकर नहीं लगता कि आपके खाते में पैसा आ गया।

अब मुझे यहाँ थोड़ा मज़ा आता है।

जिस चीज़ को बेचने की जरूरत ही नहीं है और उसके बदले आपको असली पैसा मिल सकता है, वह कितनी “कागजी” है?

यही तो सवाल है।

मैं यह नहीं कह रहा कि शेयर का भाव आज बढ़ा और कल सुबह सरकार टैक्स का बिल लेकर पहुँच जाए।

वह भी बेवकूफी हो सकती है।

शेयर आज 100 का है, कल 50 का हो सकता है।

तो unrealised gain पर कर लगाना अपने आप में आसान विषय नहीं है।

लेकिन दूसरी तरफ यह कहना भी थोड़ा मजेदार है कि यह संपत्ति तो असली है ही नहीं।

असली नहीं है तो बैंक असली पैसा क्यों दे रहा है?

बैंक तो आपकी कविता देखकर लोन नहीं दे रहा।

वह उसी संपत्ति की कीमत देखकर दे रहा है।

तो फिर मामला इतना सीधा नहीं है कि—

“शेयर बेचे नहीं, इसलिए कोई पैसा नहीं।”

पैसा शायद हाथ में नहीं है।

लेकिन आर्थिक ताकत पूरी है।

और असली खेल शायद यहीं है।

साधारण आदमी—

कमाओ → कर दो → बाकी खर्च करो।

बहुत अमीर आदमी—

संपत्ति बढ़ने दो → मत बेचो → उसी पर लोन लो → लोन का पैसा खर्च करो।

अब इसे गलत कहो, सही कहो, कानूनी कहो या चालाकी—

लेकिन फर्क तो है।

और बड़ा फर्क है।

मेरे लिए असली सवाल यही है—

अगर किसी संपत्ति को बेचने के बिना भी आप उससे अरबों डॉलर निकालकर इस्तेमाल कर सकते हैं, तो केवल यह कहना कि “यह तो अभी कागज पर है” थोड़ा अधूरा तर्क नहीं है?

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