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हम भूख से खाते हैं या खाने के लिए भूख बनाते हैं?


हम भूख से खाते हैं या खाने के लिए भूख बनाते हैं?

कभी जंगल में किसी मोटे शेर को देखा है?

इतना मोटा कि शिकार ही न कर पाए?

या कोई पक्षी इतना भारी हो गया हो कि उड़ न सके?

प्रकृति में रहने वाले जीव सामान्यतः एक सीधी व्यवस्था में जीते हैं—

**भूख लगी → भोजन खोजा → श्रम किया → खाया → रुक गए।**

मनुष्य ने यह क्रम बदल दिया।

अब हमें भूख लगे तभी हम खाएँ, ऐसा नहीं है।

चाय के साथ कुछ चाहिए।

तनाव है तो कुछ खा लेते हैं।

मन खराब है तो खाते हैं।

खुशी है तो खाते हैं।

टीवी चल रहा है तो कुछ चबाने को चाहिए।

पेट भरा है, लेकिन मिठाई सामने है—

खा लेते हैं।

यानि भोजन अब केवल भूख का उत्तर नहीं रहा।

वह मनोरंजन भी है।

पुरस्कार भी।

तनाव की दवा भी।

बोरियत का इलाज भी।

और कई बार लत भी।

प्रकृति का क्रम था—

**भूख → प्रयास → भोजन → तृप्ति।**

हमने बना दिया—

**इच्छा → सुविधा → भोजन → फिर इच्छा।**

भोजन पाने के लिए अब शरीर को बहुत कम श्रम करना पड़ता है।

मोबाइल उठाओ।

दो बटन दबाओ।

खाना दरवाजे पर।

पहले भोजन पाने के लिए शरीर को मेहनत करनी पड़ती थी।

आज भोजन से खुद को रोकने के लिए मन को मेहनत करनी पड़ती है।

और एक बात और देखिए।

जानवर भी मोटे होते हैं।

लेकिन अक्सर कहाँ?

जहाँ वे मनुष्य के साथ रहने लगे।

पालतू कुत्ता।

घर की बिल्ली।

कैद में रहने वाले जानवर।

वहाँ भी वही व्यवस्था आ गई—

भोजन आसानी से उपलब्ध।

गतिविधि कम।

और जरूरत से ज्यादा खिलाने वाला मनुष्य।

जंगल में शेर की कटोरी कोई नहीं भरता।

उसे भोजन चाहिए तो उसे चलना पड़ेगा, ढूँढना पड़ेगा, कभी शिकार करना पड़ेगा, कभी भूखा रहना पड़ेगा।

यानि मनुष्य पहले खुद प्रकृति के इस क्रम से बाहर निकला।

फिर अपने साथ रहने वाले जानवरों को भी निकाल लाया।

अब हमारी दुनिया देखिए—

लिफ्ट है।

गाड़ी है।

कुर्सी है।

स्क्रीन है।

घर पर खाना है।

घर पर खरीदारी है।

घर से काम है।

शरीर से हम कह रहे हैं—

आराम करो।

और फिर उसी शरीर से पूछते हैं—

इतना वजन कैसे बढ़ गया?

असल समस्या शायद यह है कि हमने **भूख के बिना खाना सीख लिया है।**

और जहाँ-जहाँ हमने भूख, श्रम और भोजन का संबंध तोड़ा है, वहाँ उसका असर दिखने लगा है।

प्रकृति का नियम बहुत कठिन नहीं था—

भूख लगे तो खाओ।

भोजन पाने के लिए कुछ करो।

पेट भर जाए तो रुक जाओ।

हमने तीनों बिगाड़ दिए।

फिर मोटापे पर हैरानी कैसी?

हमने अपने चारों ओर ऐसी व्यवस्था बना ली है जिसमें **मोटा होना आसान है और सामान्य वजन में रहना अनुशासन का काम बन गया है।**


वीरेन्द्र सिंह की कीबोर्ड रुपी कलम द्वारा 


भ्रमित भारतीयों के भ्रम का भ्रमण 


VirenderSingh.in 

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