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क्यों वर्ष में सबसे अधिक गुणकारी होता है भादवे अर्थात भाद्रपद माह का गोघृत?

क्यों वर्ष में सबसे अधिक गुणकारी होता है  भादवे अर्थात भाद्रपद माह का गोघृत? वर्ष में एक बार आने वाला अवसर लाभ अवश्य उठाएं ! इस वर्ष भाद्रपद मास 29 अगस्त से 26 सितम्बर 2026 तक रहेगा वीरेन्द्र गौधूली सुनिश्चित करता है कि ऊपर दी गई दिनांक के बीच एकत्रित दूध द्वारा ही भादवा घी का निर्माण हो वीरेन्द्र भाई के निरिक्षण में मशीन नहीं हाथ के बिलोने से निर्मित विश्वसनीय भादवा गौघृत अतः किसी भी घी को भादवा घी कहकर बेचने वालो से सावधान अग्रिम बुकिंग आरम्भ घी की डिलीवरी 15 सितम्बर 2026 से आरम्भ (सीमित स्टॉक) सभी भादवा गौघृत आर्डर पर  शिपिंग फ्री ********************************************** This year Bhadrapad Month Start Date: 29th August 2026 End Date : 26th September 2026 “Virendra Gaudhuli ensures that Gaughrit made from Desi Gomata Milk only collected between these dates is labelled as Bhadwa Ghee.” Beware of people who pass on any Ghee as Bhadwa Ghee Advance booking starts: 19th Jun 2026 (Limited stock) Shipping Starts: 15th Sep 2026 Shipping Free on all Bhadrapad Ghee orders ...

जानिये असल में किस धन की है धनतेरस?

जानिये किस धन की है धनतेरस ? क्यों बिना विवेक कुछ भी ख़रीद लेने का दिन नहीं है धनतेरस! और यह धन से सम्बंधित नहीं है ************************************* स्वदेशी एवं स्वास्थ्य के सन्दर्भ में धनतेरस का महत्व कुंठित एवं विकृत उपभोक्तावाद से प्रेरित बाजारीकरण के कारण धनतेरस को लेकर कुछ भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास एक प्रश्नावली के द्वारा : प्रश्न: धनतेरस में "धन" शब्द का क्या अर्थ है? उत्तर: यह बहुत कम लोग जानते है की वास्तव में धनतेरस में "धन" शब्द स्वास्थ्य के देवता धनवंतरी से लिया गया है कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। प्रश्न: अगर धन नहीं तो फिर धनतेरस का क्या महत्त्व है? उत्तर: देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें। प्रश्न: आज के दिन कुछ नया खरीदने की परंपरा क्यों है? उत्तर: समुद्र मंथन के...

*कश्यपसंहिता में वर्णित 3 हज़ार वर्ष पुराना आयुर्वेदिक टीकाकरण - स्वर्णप्राशन*

*कश्यपसंहिता में वर्णित 3 हज़ार वर्ष पुराना  आयुर्वेदिक टीकाकरण - स्वर्णप्राशन* भारत की इस धरा ने - हमारी साँस्कृतिक परंपरा ने कई महापुरुषो, संतो, शूरवीरो, बौद्धिको, महान तत्ववेत्ताओ को जन्म दिया है। पर इस परंपरा को खडी करने और इतने सारे महान चरित्रो का संगोपन कैसे किया होगा यह हमने कभी सोचा है क्या? हमारे प्राचीन ऋषिओं ने इसके लिये अथाह परिश्रम उठाया है। समाज स्वस्थ - निरोगी बने इसके लिये आज कई सामाजिक, धार्मिक संस्थान और खुद सरकार भी चिंतित और कार्यरत है। अरबो का बजट हमारे आरोग्य की रक्षा के लिये सरकार और अंतराष्ट्रीय संस्थाएँ खर्च करती है। भिन्न-भिन्न प्रकार के केम्प, सहायता, जागृकता बढें इसके लिये विज्ञापन, फरजियात टीकाकरण द्वारा बहुत ही जोरो से प्रयत्न होता रहता है। कभी कभी इसके परिणमो की ओर दृष्टि करें तो प्रयत्न के समक्ष परिणाम बहुत ही अल्प मात्रा में दिखता है । समाज में शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता बढी है, पर मानसिक स्वास्थ्य का क्या? उसके लिये कभी किसी ने विचार किया है क्या?...... मानसिक रोग, निर्माल्य एवं असंस्कारी समाज अगर दीर्घायुष्य पाता है त...

महाभारत से कहाँ भारत!

महाभारत से कहाँ (गया) भारत   पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें । *पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ।* "पुस्तक के बीच  *पौधे की पत्ती* *और मोरपंख रखने* से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था"।  कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था । *हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था ।* *माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी , न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी* ।  सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।  *एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा* हमने कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं ।  *स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?* पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज...

"जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?"

"जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?" बचपन में सुबह हम जब बिस्तर से नहीं उठते थे ऊंघते रहते थे तो माँ एक वाक्य कहती थी कि "जागे हुए को मैं क्या जगाऊँ?" आज इस समाज पर यह बात सटीक बैठती है जो अधिकतर अपनी जीभ के स्वाद का गुलाम बन, जान-बूझकर अनजान बन वही खा रहा है जिसने आपके घर के सदस्य को अस्पताल का सदस्य (मरीज़) बनाया क्योंकि ऐसे अस्पताल में आने वाले लोगो को सोशल मीडिया के युग में सही गलत का पता न हो वह मैं मान ही नहीं सकता। आने वाली पीढ़ियां हमारे आज का आचरण से निर्मित होती है इस बात को ध्यान में रख यह पोस्ट पढ़ें किसी मित्र के कार्य हेतु एक तथाकथित चमक दमक होटल जैस हो(स्पी)टल में जाना हुआ मरीज़ो से भरा और परन्तु इलाज से खाली था. लाइन लगाकर लोग पैसा जमा करने की होड़ में थे और समय उनके पास भरपूर था।  यह मेरा मानना है की पैसा और समय सबके पास होता है और इसे लूटने की कला आधुनिक अस्पतालों ने बखूबी सीख लिया है। यह जो उदहारण मैं दे रहा हूँ उस से पुनः यह बात साबित हो जाती है की जिस चिकित्सा व्यवस्था वालो को इतना भी भान नहीं है की अस्पताल में स्वस्थ भोजन का क्या अर्थ य...

पेट में मोम (WAX) जमा कैसे करें?

पेट में मोम (WAX) जमा कैसे करें? यह बहुत आसान है!  Disposable पेपर कप में चाय, पानी दूध आदि आदि प्रतिदिन प्रयोग करके यह आसानी से किया जा सकता है  आइये जानते है कैसे? **************************************************** आखिरकार, आज का युग सफाई पसंद है वो जीवन में हर पहलु में डिस्पोजेबल (Disposable) तकनीक का प्रयोग करता है चाहे वो रिश्ते हो या बर्तन USE and THROW! विशेषकर शादियों में, बड़े बड़े कॉर्पोरेट दफ्तरों में छोटे छोटे ढाबो पर, चाय की दुकान पर, ट्रेन में, बस में और न जाने कहाँ कहाँ सब विदेशियों की तरह डिस्पोजेबल प्रयोग करने लगे है। क्योंकि सब बहुत पढ़े लिखे है कोई गलत काम नहीं करते। बर्तन जूठा भी नहीं करते और यह सोचकर की यह प्लास्टिक का कचरा चन्द्रमा पर चला जायेगा अपनी जीवन शैली में सब कुछ Disposable प्रयोग करने लगे। वैसे लिख तो दिया है की जनहित में जारी लेकिन ऐसे जन का हित करने के मन नहीं है जो जानबूझ कर अपनी आने वाली पीढियों के लिए संस्कारो की नहीं बल्कि दिल्ली जैसे कचरे के पहाड़ और बीमारी से भरे एक समाज की विरासत छोड़ कर जायेगा। कैसे बनता है यह? ...