बचपन की छोटी-सी ऋतु
बच्चों का बचपन बड़ा विचित्र होता है।
जब चल रहा होता है तो लगता है कि बहुत लंबा है।
घर में खिलौने बिखरे हैं।
हर थोड़ी देर में—“पापा सुनो ना…” “मम्मी देखो ना…”
खाना नहीं खाना।
सोना नहीं है।
सौ प्रश्न पूछने हैं।
और हम सोचते हैं—
थोड़ा बड़ा हो जाए तो कुछ चैन मिले।
मिलेगा।
लेकिन शायद तब पता चलेगा कि जिस शोर से चैन माँग रहे थे, वही घर की सबसे सुंदर ध्वनि थी।
बच्चे हमारे बच्चे पूरे जीवन रहते हैं, लेकिन बच्चे बनकर बहुत थोड़े वर्ष रहते हैं।
एक दिन खिलौने कम होने लगेंगे।
फिर गोद में बैठना बंद।
फिर उंगली पकड़कर चलना बंद।
फिर विद्यालय के द्वार पर कहेगा—
“आप यहीं छोड़ दो, मैं चला जाऊँगा।”
और कुछ वर्षों बाद—
“आपको आने की आवश्यकता नहीं है।”
यह सब किसी घोषणा के साथ नहीं होता।
बस धीरे-धीरे होता है।
और जब तक हमें पता चलता है कि बचपन जा रहा है, तब तक वह काफी दूर निकल चुका होता है।
लेकिन हमें उसे बड़ा करने की इतनी जल्दी क्यों है?
आज के माता-पिता को देखकर कई बार लगता है कि हम माता-पिता कम और फल के व्यापारी अधिक हो गए हैं।
कच्चा फल सामने रखा है और चिंता यह है कि जल्दी पक क्यों नहीं रहा!
ढाई वर्ष का हुआ—
बालवाटिका भेजो।
तीन वर्ष का हुआ—
अक्षर क्यों नहीं पहचानता?
चार वर्ष में पढ़ना आ जाना चाहिए।
पाँच वर्ष का हुआ—
अब प्रतियोगिता शुरू।
फिर नृत्य, गणना, उच्चारण, व्यक्तित्व विकास, कम्प्यूटर…
अरे भाई!
बच्चा है या आम की पेटी, जिसे कार्बाइड लगाकर जल्दी पकाना है?
वह अगले पन्द्रह-सत्रह वर्ष पढ़ने ही वाला है।
विद्यालय जाएगा।
गृहकार्य करेगा।
परीक्षाएँ देगा।
प्रतियोगिता करेगा।
नौकरी करेगा।
समय-सीमाओं के पीछे भागेगा।
जीवन उसे बहुत जल्दी बड़ा कर देगा।
फिर उसके जीवन के शुरुआती चार-पाँच वर्ष भी हमें संसार को ही क्यों सौंप देने हैं?
जहाँ माता-पिता दोनों कार्य करते हैं और कोई दूसरा उपाय नहीं है, वह अलग परिस्थिति है।
लेकिन केवल इसलिए कि—
“सब भेज रहे हैं।”
तो हमें भी भेजना है?
कहीं हम बच्चे को संसार के लिए तैयार करने की जल्दी में वह समय संसार को तो नहीं दे रहे जो वास्तव में हमारा और उसके बचपन का था?
संसार से जोड़ने से पहले अपने से जोड़िए
हम कहते हैं—
“बच्चे को संसार के लिए तैयार करना है।”
बिल्कुल कीजिए।
लेकिन संसार के लिए तैयार करने का पहला चरण क्या है?
अंग्रेजी बोलना?
जल्दी पढ़ना?
गिनती?
नहीं।
मेरे हिसाब से सबसे पहले उसे अपने माता-पिता से जुड़ना आना चाहिए।
उसे यह विश्वास होना चाहिए कि मुझसे भूल हो जाए तो घर जा सकता हूँ।
हार जाऊँ तो घर जा सकता हूँ।
कोई धोखा दे दे तो घर जा सकता हूँ।
डर लग रहा हो तो घर जा सकता हूँ।
पूरा संसार मेरे विरुद्ध खड़ा हो जाए, तब भी दो लोग ऐसे हैं जिनके सामने मुझे कुछ बनने का अभिनय नहीं करना है।
बस यही संबंध बना दीजिए।
संसार उसके लिए आसान नहीं हो जाएगा।
उसे असफलता भी मिलेगी।
गलत लोग भी मिलेंगे।
छल भी मिलेगा।
तुलना भी होगी।
टूटे संबंध भी मिलेंगे।
लेकिन एक अंतर रहेगा—
वह यह सब अकेला नहीं झेलेगा।
स्वतंत्र बनाने का अर्थ यह नहीं कि बच्चे को किसी की आवश्यकता ही न रहे।
असली स्वतंत्रता यह है कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके और साथ ही उसे यह भी पता हो—
गिर गया तो लौटना कहाँ है।
संबंध बड़ी घटनाओं से नहीं बनते
बच्चा आज कहता है—
“पापा देखो मैंने क्या बनाया।”
“मम्मी आज विद्यालय में क्या हुआ पता है?”
“मेरे साथ खेलो।”
“मेरे पास बैठो।”
हमारे लिए यह पाँच मिनट की बाधा है।
उसके लिए यही पाँच मिनट शायद यह तय कर रहे हैं कि दस वर्ष बाद कोई बड़ी परेशानी होने पर वह हमारे पास आएगा या नहीं।
आज वह छोटा-सा डर लेकर आया और हमने कह दिया—
“इतनी सी बात से डरता है?”
आज वह विद्यालय की बात बताने आया और हमने कहा—
“अभी परेशान मत करो।”
तो वह धीरे-धीरे क्या सीख रहा है?
अपनी बात स्वयं रखना।
फिर वही बच्चा पन्द्रह-सोलह वर्ष का होकर कमरे का द्वार बंद करने लगता है और हम कहते हैं—
“आजकल बच्चे माता-पिता को कुछ बताते ही नहीं।”
क्यों बताए?
जब वह बताना सीख रहा था, तब हमने सुनना सीखा था क्या?
अंक बड़े हैं या बच्चा?
हम बच्चों को पढ़ाते किसलिए हैं?
उनका जीवन अच्छा हो इसलिए।
लेकिन विचित्र बात देखिए—
कई घरों में धीरे-धीरे पढ़ाई ही जीवन से बड़ी हो जाती है।
अंक कम आए तो घर में मातम।
असफल हो गया तो मानो सब समाप्त।
कभी उन माता-पिता से पूछिए जिनके बच्चे ने कम अंक आने या परीक्षा में असफल होने के बाद अपना जीवन समाप्त कर लिया।
उनसे पूछिए—
अब आपको उसके कम अंक आने का दुःख है?
अब आपको उसकी असफलता की चिंता है?
अब भी लगता है कि उसका एक वर्ष पीछे रह जाना बहुत बड़ी बात थी?
वे शायद केवल यही कहेंगे—
“तू एक बार वापस आ जा… हम तुझे पढ़ने के लिए भी नहीं कहेंगे।”
बस।
बच्चे के चले जाने के बाद वही परीक्षा कितनी छोटी हो जाती है।
अंकतालिका रह जाती है।
विद्यालय रह जाता है।
कक्षा अगले वर्ष फिर लगती है।
परीक्षा दोबारा हो जाती है।
बस बच्चा दोबारा नहीं आता।
इसलिए बच्चे को यह विश्वास अवश्य दीजिए कि—
घर वह स्थान नहीं जहाँ केवल जीतकर आया जा सकता है।
घर वह स्थान है जहाँ हारकर भी लौटा जा सकता है।
वह कह सके—
“पापा, मुझसे नहीं हुआ।”
और उत्तर मिले—
“कोई बात नहीं, पहले मेरे पास बैठ।”
परीक्षा फिर हो जाएगी।
रास्ता बदला जा सकता है।
एक वर्ष दोबारा लगाया जा सकता है।
लेकिन जीवन बचा रहना चाहिए।
एक दिन हम अपने माता-पिता की उम्र के हो जाते हैं
फिर जीवन एक और विचित्र बात समझाता है।
एक दिन अचानक आपको ध्यान आता है—
मैं अब लगभग उतनी ही उम्र का हूँ जितने मेरे पिता मेरी बचपन की स्मृतियों में थे।
और तब बड़ा मजेदार अनुभव होता है।
बचपन में पिता बहुत बड़े लगते थे।
लगता था उन्हें सब पता है।
वे डरते नहीं होंगे।
उलझते नहीं होंगे।
हर निर्णय बहुत सोच-समझकर लेते होंगे।
माँ को देखकर लगता था कि उन्हें घर, बच्चे और जीवन सब संभालना आता है।
फिर स्वयं उसी उम्र में पहुँचकर देखते हैं—
अरे!
मैं तो आज भी कई बातों को समझने का प्रयास ही कर रहा हूँ।
तब पहली बार अपने माता-पिता भी कुछ अलग दिखाई देते हैं।
वे भी जीवन पहली बार ही जी रहे थे।
वे भी माता-पिता पहली बार बने थे।
वे भी गलतियाँ करते होंगे।
वे भी रात को सोचते होंगे—
“पता नहीं बच्चे के लिए सही कर रहा हूँ या गलत।”
हम उन्हें सर्वज्ञ समझते थे।
असल में वे भी हमारे जैसे ही लोग थे—
जीवन को समझते हुए जीवन जी रहे थे।
और शायद हमारे बच्चों को भी हमसे कोई पूर्ण पिता या पूर्ण माँ नहीं चाहिए।
उन्हें ऐसे माता-पिता चाहिए जो उपस्थित हों।
जो दिशा दें।
डाँटें भी।
लेकिन सुनें भी।
और कभी अंक पूछने से पहले यह भी पूछ लें—
“मन ठीक है?”
बचपन वापस नहीं आता
पहले पाँच वर्ष वापस नहीं आएँगे।
पाँचवीं कक्षा दोबारा हो सकती है।
पाठ्यक्रम फिर पढ़ा जा सकता है।
नौकरी बदली जा सकती है।
लेकिन तीन वर्ष की उम्र में वह जिस तरह आपकी छाती पर सिर रखकर सोता था
उसका कोई दूसरा अवसर नहीं होता।
आज घर में खिलौने बिखरे हैं तो कुछ देर बिखरे रहने दीजिए।
आज बार-बार “पापा…” “मम्मी…” सुनाई दे रहा है तो कभी काम रोककर उत्तर भी दे दीजिए।
आज वह हाथ पकड़ना चाहता है तो पकड़ लीजिए।
आज गोद चाहता है तो उठा लीजिए।
क्योंकि एक दिन कमरा साफ होगा।
घर शांत होगा।
आपके पास समय भी होगा।
और वही बच्चा अपनी दुनिया में व्यस्त होगा।
तब शायद मन में आए—
इतनी जल्दी बड़ा होने की आखिर आवश्यकता क्या थी?
बचपन सच में एक छोटी-सी ऋतु है।
और इसकी सबसे बड़ी विडम्बना यही है—
जब यह हमारे घर में होती है तब हम इसके बीतने की प्रतीक्षा करते हैं।
और जब बीत जाती है तब उसी को याद करते हैं।
क्योंकि बहुत देर से समझ आता है—
वह कोई साधारण ऋतु नहीं थी।
वह जीवन का वसंत था।
वीरेन्द्र की कीबोर्ड रूपी कलम से
भ्रमित भारतीयो के भ्रम का भ्रमण

🙏🙏🙏🙏🙏
जवाब देंहटाएं🙏🙏🙏🙏🙏
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर लेख वीरेंद्र जी।
जवाब देंहटाएंलिखते आप सदैव ही बहुत अच्छा है लेकिन आज आपने भावुक कर दिया।
यह जीवन जीने के लिए है।
जवाब देंहटाएंएक लेखक ने लिखा है-
"दौड़ो
जरूर दौड़ौ
लेकिन यह याद रखो कि रूकना कहाँ है। "
अपने बच्चों के पास रूको, उनसे संवाद करो।
मैं अपने बच्चों को रोज कहानियाँ सुनाता हूँ। उनके साथ खेल खेलता हूँ। बहुत आनंद आता है। जीवन का रह अद्भुत है। और अपने बच्चों के साथ मुझे यह रस मिलता है।