आज किसी भी रेस्तराँ में बैठ जाइए।
चार लोगों का परिवार मिलेगा। माँ सामने बैठी है, पिता उसके सामने। दो बच्चे साथ हैं। खाना भी आ चुका है।
लेकिन मेज़ पर सबसे ज़्यादा बातचीत किससे हो रही है?
मोबाइल से।
बेटा रील देख रहा है। पिता समाचार पढ़ रहे हैं। माँ किसी समूह में संदेश भेज रही है। बेटी तस्वीर खींच रही है।
चार लोग साथ बैठे हैं, पर चारों की दुनिया अलग-अलग है।
यही दृश्य देखकर मुझे अचानक Pixar की फिल्म WALL·E याद आती है।
लोग अक्सर कहते हैं कि यह पर्यावरण पर बनी फिल्म है। मुझे हमेशा लगता है कि यह फिल्म कचरे की नहीं, आदतों की कहानी है।
फिल्म में पृथ्वी प्लास्टिक से भर जाती है। इंसान पृथ्वी छोड़कर अंतरिक्ष में चला जाता है। वहाँ उसके पास हर सुविधा है। चलने की ज़रूरत नहीं, सोचने की ज़रूरत नहीं, बस एक कुर्सी पर बैठे रहिए और स्क्रीन देखते रहिए।
पहली बार जब मैंने यह फिल्म देखी थी, तब लगा था कि यह बहुत दूर के भविष्य की कल्पना है।
आज दोबारा देखता हूँ तो लगता है, भविष्य हमारे दरवाज़े पर नहीं, हमारी जेब में रखा हुआ है।
फ़र्क बस इतना है कि फिल्म में लोगों के हाथ में बड़ी स्क्रीन थी, हमारे हाथ में छोटा मोबाइल है।
...
भारत अभी WALL·E की दुनिया नहीं बना है। यही हमारी सबसे बड़ी उम्मीद भी है।
आज भी गाँवों में लोग चौपाल पर बैठते हैं। मोहल्लों में बच्चे खेलते दिखाई दे जाते हैं। घरों में त्योहार मनते हैं। दादी अब भी कहानी सुनाती है, माँ अब भी रसोई में गुनगुनाती है, पिता अब भी बिना वजह बाज़ार तक टहल आते हैं।
लेकिन इसी भारत में एक दूसरा दृश्य भी तेजी से बढ़ रहा है।
बच्चा रो रहा है तो उसके हाथ में मोबाइल दे दो।
खाना नहीं खा रहा? मोबाइल चला दो।
मेहमान आए हैं? बच्चे को दूसरे कमरे में मोबाइल देकर भेज दो।
धीरे-धीरे मोबाइल खिलौना नहीं रहता। वह चुप कराने का साधन बन जाता है। फिर वही साधन आदत बनता है, और एक दिन वही आदत स्वभाव बन जाती है।
WALL·E की सबसे बड़ी चेतावनी यही है कि इंसान एक दिन मशीन नहीं बनेगा।
वह धीरे-धीरे मशीन जैसा जीने लगेगा।
उसे लगेगा कि वह स्वतंत्र है, जबकि उसकी अगली हँसी, अगला गुस्सा, अगली खरीदारी और अगला विचार किसी algorithm ने पहले ही तय कर दिया होगा।
सबसे दुखद बात यह नहीं होगी कि लोग मोबाइल देख रहे होंगे।
सबसे दुखद बात यह होगी कि उन्हें यह सामान्य लगने लगेगा।
फिल्म का एक छोटा-सा रोबोट हमें याद दिलाता है कि जीवन सुविधा से नहीं चलता।
जीवन चलता है जिज्ञासा से।
चलने से।
मिट्टी छूने से।
पेड़ लगाने से।
किसी की आँखों में देखकर बात करने से।
शायद इसलिए WALL·E आज भी विज्ञान-कथा नहीं लगती।
वह आईना लगती है।
और आईने की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह भविष्य नहीं दिखाता।
वह केवल यह दिखाता है कि आज हम कहाँ खड़े हैं।
वीरेन्द्र की कीबोर्ड रुपी कलम से

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