प्रेम का आधार कारण नहीं, साथ निभाना है
यदि कोई तुमसे प्रेम करता है और इसलिए तुम भी उससे प्रेम करते हो,
तो वह अपनापन है।
यदि किसी के रूप को देखकर प्रेम हो जाए,
तो वह आकर्षण है।
यदि किसी के धन, पद या सुख-सुविधाओं के कारण प्रेम हो,
तो वह लाभ की भावना है।
यदि किसी के अच्छे स्वभाव और सरल व्यवहार के कारण प्रेम हो,
तो वह सम्मान है।
लेकिन यदि तुम स्वयं यह न बता सको कि तुम उससे प्रेम क्यों करते हो,
यदि उसकी कमियाँ भी तुम्हें उससे दूर न कर सकें,
यदि उसकी प्रसन्नता में तुम्हें प्रसन्नता मिले और उसके दुःख में तुम्हारा मन भी भर आए,
तो वही सच्चा प्रेम है।
क्योंकि सच्चा प्रेम किसी कारण से नहीं, मन के जुड़ाव और साथ निभाने से जन्म लेता है।
भारत में एक समय ऐसा था जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह तय करते थे। गाँवों में नाई भी परिवारों को अच्छी तरह जानता था। वह केवल संदेश पहुँचाने वाला नहीं होता था, बल्कि परिवारों को जोड़ने का काम भी करता था। उसके बताए हुए अनेक संबंध जीवन भर चलते थे।
उस समय अधिकतर युवक और युवती अपने जीवनसाथी से विवाह के बाद ही परिचित होते थे। वे साथ रहते-रहते एक-दूसरे को समझते थे। समझ से विश्वास बना, विश्वास से प्रेम और प्रेम से जीवन भर का साथ।
उन्होंने शायद कभी एक-दूसरे से “आई लव यू” नहीं कहा, फिर भी उनका पूरा जीवन यही बताता था कि प्रेम शब्दों से नहीं, आचरण से दिखाई देता है।
आज समय बदल गया है। बहुत से युवक-युवतियाँ अपना जीवनसाथी स्वयं चुनते हैं। यह उनका अधिकार है। फिर भी यह भी देखने में आता है कि केवल आकर्षण या थोड़े समय की पसंद पर बने अनेक संबंध अधिक समय तक नहीं चल पाते।
किसी समाज की शक्ति इस बात में नहीं होती कि विवाह किसने तय किया, बल्कि इस बात में होती है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति कितना धैर्य, विश्वास, त्याग और उत्तरदायित्व रखते हैं।
आज हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या हम संबंध बनाने में आगे बढ़े हैं, या उन्हें निभाने की क्षमता कम होती जा रही है।
रिश्ते किसने तय किए, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है।
महत्वपूर्ण यह है कि उन्हें मन से, धैर्य से और जीवन भर निभाया जाए।
जहाँ “मैं” से अधिक “हम” का स्थान होता है, वहीं से सच्चे प्रेम की शुरुआत होती है।
वीरेन्द्र की कीबोर्ड रूपी कलम से
VirenderSingh.in
यदि उसकी प्रसन्नता में तुम्हें प्रसन्नता मिले और उसके दुःख में तुम्हारा मन भी भर आए,
तो वही सच्चा प्रेम है।
क्योंकि सच्चा प्रेम किसी कारण से नहीं, मन के जुड़ाव और साथ निभाने से जन्म लेता है।
भारत में एक समय ऐसा था जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह तय करते थे। गाँवों में नाई भी परिवारों को अच्छी तरह जानता था। वह केवल संदेश पहुँचाने वाला नहीं होता था, बल्कि परिवारों को जोड़ने का काम भी करता था। उसके बताए हुए अनेक संबंध जीवन भर चलते थे।
उस समय अधिकतर युवक और युवती अपने जीवनसाथी से विवाह के बाद ही परिचित होते थे। वे साथ रहते-रहते एक-दूसरे को समझते थे। समझ से विश्वास बना, विश्वास से प्रेम और प्रेम से जीवन भर का साथ।
उन्होंने शायद कभी एक-दूसरे से “आई लव यू” नहीं कहा, फिर भी उनका पूरा जीवन यही बताता था कि प्रेम शब्दों से नहीं, आचरण से दिखाई देता है।
आज समय बदल गया है। बहुत से युवक-युवतियाँ अपना जीवनसाथी स्वयं चुनते हैं। यह उनका अधिकार है। फिर भी यह भी देखने में आता है कि केवल आकर्षण या थोड़े समय की पसंद पर बने अनेक संबंध अधिक समय तक नहीं चल पाते।
किसी समाज की शक्ति इस बात में नहीं होती कि विवाह किसने तय किया, बल्कि इस बात में होती है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति कितना धैर्य, विश्वास, त्याग और उत्तरदायित्व रखते हैं।
आज हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या हम संबंध बनाने में आगे बढ़े हैं, या उन्हें निभाने की क्षमता कम होती जा रही है।
रिश्ते किसने तय किए, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है।
महत्वपूर्ण यह है कि उन्हें मन से, धैर्य से और जीवन भर निभाया जाए।
जहाँ “मैं” से अधिक “हम” का स्थान होता है, वहीं से सच्चे प्रेम की शुरुआत होती है।
वीरेन्द्र की कीबोर्ड रूपी कलम से
VirenderSingh.in

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें