हनुमान अंश : ₹10 लाख से ₹300 करोड़ तक…
जब मैंने पहली बार पूछा था—
“क्या हनुमान अंश उत्तर भारत की कान्तारा बनेगी?”
तब यह सवाल थोड़ा बड़ा लग रहा था।
करीब ₹2 करोड़ की फिल्म।
कोई बड़ा सितारा नहीं।
कोई ऐसा प्रचार नहीं कि सुबह उठो तो हर जगह उसी का चेहरा दिखे।
पहले दिन लगभग ₹10 लाख की कमाई।
मतलब शुरुआत देखकर कोई भी कह देता—
चलो, एक और छोटी धार्मिक फिल्म आई और चली गई।
लेकिन गई नहीं।
धीरे-धीरे लोग देखने लगे।
फिर देखने वाले दूसरों से कहने लगे—
“एक बार देख आओ।”
और वही काम हो गया जो आजकल कई बार ₹50-100 करोड़ का प्रचार भी नहीं कर पाता।
फिल्म ₹300 करोड़ के पार पहुँच गई।
अब मुझे इसमें सबसे मजेदार बात यही लगती है—
फिल्म नहीं बदली। दर्शक बढ़ता गया।
हनुमान अंश नीब करौरी बाबा के जीवन और हनुमान भक्ति से प्रेरित फिल्म है।
इसलिए नाम देखकर अगर कोई यह सोचकर जाए कि अभी हनुमान जी आएँगे, पहाड़ उठाएँगे, VFX फटेगा और पर्दा हिलेगा—
तो भाई, गलत फिल्म में आ गए।
यह उस तरह की फिल्म नहीं है।
यह सीधी है।
बहुत सीधी।
कई जगह इतनी सीधी कि लगता है थोड़ा और सिनेमाई हो सकती थी।
कुछ दृश्य सच में फिल्म से ज्यादा अच्छे धार्मिक धारावाहिक जैसे लगते हैं।
तकनीकी कमियाँ भी हैं।
लेकिन अजीब बात यह है कि फिल्म देखते हुए ये कमियाँ दिखाई तो देती हैं, पर फिल्म से बाहर नहीं फेंकतीं।
क्यों?
मेरे हिसाब से एक ही कारण है—
फिल्म बनावटी नहीं लगती।
आजकल समस्या यह है कि बड़े बजट में सब कुछ मिल जाता है—
कैमरा।
VFX।
बड़े चेहरे।
भारी संगीत।
बस कई बार आत्मा नहीं मिलती।
यहाँ उल्टा है।
साधन कम हैं।
पर भावना नकली नहीं लगती।
शोभिनव सत्या को देखते हुए भी यही लगता है।
वह कई जगह अभिनय करते हुए कम और उस पात्र में रहते हुए ज्यादा लगते हैं।
और यह जानना कि वह मूल रूप से सहायक निर्देशक थे और परिस्थितियों में मुख्य भूमिका तक पहुँचे—
फिल्म की अपनी यात्रा जैसा ही लगता है।
जिसे सामने आना ही नहीं था, वही सामने आ गया।
जिस फिल्म से किसी को इतनी उम्मीद नहीं थी, वही ₹300 करोड़ के पार चली गई।
अब Kantara वाली बात।
क्या हनुमान अंश अब उत्तर भारत की Kantara बन गई?
मेरे हिसाब से अभी भी नहीं।
और इसमें कोई अपमान नहीं है।
Kantara केवल आस्था की फिल्म नहीं थी।
उसमें जमीन थी।
जंगल था।
स्थानीय परंपरा थी।
सत्ता थी।
संघर्ष था।
मनुष्य था।
और अंत में देवत्व आता था।
इसीलिए उसका चरम दृश्य केवल “धार्मिक दृश्य” नहीं रहता।
वह पूरी कहानी का विस्फोट बन जाता है।
हनुमान अंश इतनी परतदार फिल्म नहीं है।
यह ज्यादा सरल है।
लेकिन अब मुझे दोनों में दूसरी समानता दिखती है।
दोनों ने दर्शक के बारे में फिल्म उद्योग की एक धारणा गलत सिद्ध कर दी।
भारतीय दर्शक अपनी जड़ों की कहानी देखना चाहता है।
और उसे इसके लिए शर्म नहीं है।
मुझे लगता है हमारे फिल्मकारों ने खुद ही मान लिया था कि अगर संत, परंपरा, लोककथा, तीर्थ, गाँव या आध्यात्मिकता पर फिल्म बनाओगे तो वह “पुरानी” लगने लगेगी।
इसलिए आधुनिक दिखने के चक्कर में कहानी भारतीय रहती थी, लेकिन उसकी आत्मा कहीं और से किराये पर ले आते थे।
और जब धर्म पर फिल्म बनाते थे तो दूसरा रोग—
इतना शोर।
इतना VFX।
इतना उपदेश।
कि आदमी कहानी देखने गया था या प्रवचन सुनने, समझ ही न आए।
हनुमान अंश ने कम-से-कम इतना तो दिखा दिया—
कहानी अपनी हो तो उसे नकली आधुनिकता का मेकअप लगाने की जरूरत नहीं।
लेकिन अब एक खतरा भी है।
₹300 करोड़ देखकर कल से बीस निर्माता संत, बाबा, मंदिर, चमत्कार और हनुमान जी पर फिल्में बनाना शुरू कर दें—
तो उनमें से अधिकतर शायद पिटेंगी।
क्योंकि सीख यह नहीं है कि—
“धार्मिक फिल्म बनाओ, पैसा आएगा।”
इतना आसान होता तो हर मंगलवार blockbuster आती।
सिर्फ तिलक लगा देने से पात्र नहीं बनता।
भगवा पहनाने से कहानी मजबूत नहीं होती।
चमत्कार डाल देने से भाव नहीं आता।
और भक्ति पटकथा की जगह नहीं ले सकती।
यही गलती हुई तो दर्शक उतनी ही जल्दी नकार भी देगा।
मेरे लिए हनुमान अंश की ₹300 करोड़ वाली सफलता का असली मतलब कुछ और है।
यह फिल्म शायद बहुत बड़ी फिल्म नहीं है।
लेकिन इसने बहुत बड़ा संकेत दिया है।
दर्शक तैयार है।
वह अपनी कहानियाँ देखना चाहता है।
संतों की।
लोकदेवताओं की।
तीर्थों की।
गाँवों की।
स्थानीय मान्यताओं की।
इतिहास की।
उन कथाओं की जो हमारे घरों में सुनी गईं लेकिन पर्दे पर शायद ही आईं।
हमारे पास सामग्री की कमी कभी थी ही नहीं।
कमी शायद विश्वास की थी।
फिल्म बनाने वालों को अपनी ही कहानी पर विश्वास नहीं था।
दर्शक ने इस बार जेब से वोट देकर बता दिया—
“तुम बनाओ तो सही… हम देखने आएँगे।”
इसलिए अब मेरा पुराना सवाल—
“क्या हनुमान अंश उत्तर भारत की कान्तारा बनेगी?”
शायद उतना जरूरी नहीं रहा।
अब असली सवाल है—
क्या इसके बाद उत्तर भारत अपनी कहानियाँ ढूँढना शुरू करेगा?
अगर करेगा, तो हनुमान अंश की सबसे बड़ी सफलता ₹300 करोड़ नहीं होगी।
उसके बाद बनने वाली अच्छी फिल्में होंगी।
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