भगत सिंह जी… आप मत आना!
आज भगत सिंह जी का जन्मदिवस है।
सुबह से चित्र लगेंगे।
मालाएँ चढ़ेंगी।
“इंकलाब जिंदाबाद” गूँजेगा।
नेता श्रद्धांजलि देंगे और हम भी दो पंक्तियाँ लिखकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेंगे।
बस मेरी भगत सिंह जी से एक प्रार्थना है—
आज वापस मत आना।
जिस भारत के लिए 23 वर्ष की उम्र में हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ गए थे, आज उसे देखकर कहीं पहली बार मृत्यु का दुःख न हो जाए।
और कहीं मन में यह प्रश्न न आ जाए—
“इतनी जल्दी क्या थी भगत सिंह? थोड़ा और जी लेता!”
यह बात मैं उनकी ओर से नहीं कह रहा। ऐसा उन्होंने कभी नहीं कहा। उल्टा, उनके लेख बताते हैं कि उन्होंने अपने चुने हुए मार्ग और बलिदान को बहुत सोच-समझकर स्वीकार किया था।
लेकिन आज का भारत देखकर यह व्यंग्य अपने आप निकलता है।
भगत सिंह 23 वर्ष के थे।
और आज 23 वर्ष का युवा?
सबको एक तराजू में नहीं तौलूँगा। आज भी बहुत से युवा पढ़ रहे हैं, परिश्रम कर रहे हैं, कुछ नया बना रहे हैं, सेना में जा रहे हैं, खेत संभाल रहे हैं, व्यवसाय खड़े कर रहे हैं।
लेकिन एक बड़ी भीड़ ऐसी भी तैयार हुई है जिसे देश बदलने से पहले रील बदलनी है।
पाँच मिनट खाली मिले—
मोबाइल।
खाना खा रहे हैं—
मोबाइल।
घर में चार लोग बैठे हैं—
चारों के हाथ में मोबाइल।
और देश की चिन्ता?
वह भी मोबाइल पर ही कर लेंगे।
किसी ने तीस सेकंड में समझा दिया कि देश खतरे में है।
दूसरे ने अगले तीस सेकंड में समझा दिया कि देश विश्वगुरु बन चुका है।
एक मिनट में पूरा राजनीतिक ज्ञान सम्पन्न।
अब किताब खोलने की क्या आवश्यकता है?
और मजे की बात देखिए—
भगत सिंह स्वयं खूब पढ़ते थे। अपने प्रसिद्ध लेख में उन्होंने आलोचना और स्वतंत्र चिंतन को क्रांतिकारी के लिए आवश्यक माना।
हमने दोनों से छुट्टी पा ली।
आलोचना केवल उसकी करेंगे जो हमारे दल का नहीं है।
और स्वतंत्र चिंतन?
वह तो पार्टी के संदेश समूह में सुबह-सुबह आ जाता है।
वहाँ से जो मिला, आगे भेज दिया।
अब विचार बनाने का श्रम भी बच गया।
एक तरफ वाला अपने नेता की प्रत्येक बात में राष्ट्रहित खोज लेता है।
दूसरी तरफ वाला उसी बात में राष्ट्र का विनाश खोज लेता है।
घटना वही है।
देश वही है।
बस चश्मे अलग-अलग हैं।
और दोनों को पूरा विश्वास है कि—
अंधा सामने वाला है।
यही देखकर भगत सिंह शायद सबसे अधिक चकराते।
जिस व्यक्ति ने अपने समय के बड़े से बड़े नाम को भी आलोचना से ऊपर मानने से इनकार किया, आज उसी के देश में नेता फिर आलोचना से ऊपर पहुँचने लगे हैं। भगत सिंह ने व्यक्ति-पूजा वाली इसी मानसिकता पर चोट की थी—किसी बड़े व्यक्ति की प्रत्येक बात को केवल उसके बड़े होने के कारण सही मान लेना उनके लिए स्वतंत्र विचार नहीं था।
लेकिन हमें भगत सिंह का यह वाला भाग थोड़ा असुविधाजनक लगता है।
हमें भगत सिंह की तस्वीर चाहिए।
टोपी चाहिए।
मूँछ चाहिए।
“इंकलाब जिंदाबाद” चाहिए।
भगत सिंह जैसा प्रश्न पूछने वाला दिमाग नहीं चाहिए।
क्योंकि वह अपने नेता से भी प्रश्न करेगा।
अपनी सरकार से भी।
विपक्ष से भी।
समाज से भी।
और सबसे खतरनाक अपने स्वयं के विचार से भी।
ऐसा नागरिक किसी भी राजनीतिक दल के लिए थोड़ा असुविधाजनक होता है।
भक्त बनाना सरल है।
विरोधी बनाना भी सरल है।
स्वतंत्र मनुष्य बनाना कठिन है।
और राजनीति ने यह कला अच्छी तरह सीख ली है—
युवाओं को मुद्दे दो।
प्रतिदिन नया क्रोध दो।
आज इस पर लड़ो।
कल उस पर लड़ो।
परसों नया विषय आ जाएगा।
बस इतना ध्यान रहे कि वह आपस में लड़ता रहे और कभी यह न पूछ बैठे—
मेरी शिक्षा कैसी है?
रोजगार कहाँ है?
मेरे शहर की हवा-पानी कैसे हैं?
मेरे कर का पैसा कहाँ जा रहा है?
मेरे प्रतिनिधि ने पाँच वर्ष में किया क्या?
और मैं स्वयं अपने जीवन में कर क्या रहा हूँ?
यहीं असली खतरा है।
क्योंकि नारा लगाने वाला युवा सत्ता के लिए उतना खतरनाक नहीं होता जितना हिसाब माँगने वाला युवा।
और यह बात केवल आज की किसी एक सरकार पर लागू करके निकल मत जाइए।
सरकारें बदलती रही हैं। झंडे बदलते रहे हैं।
नारे बदलते रहे हैं।
नेताओं के चेहरे बदलते रहे हैं।
हमारी नेता-भक्ति नहीं बदली।
कल किसी और के नाम की जय थी।
आज किसी और की है।
कल फिर किसी और की हो जाएगी।
हमने लोकतंत्र तो स्वीकार कर लिया—
राजा खोजने की आदत नहीं छोड़ी।
इसीलिए भगत सिंह को जन्मदिवस पर याद करना बहुत आसान है।
23 मार्च को शहीद दिवस मनाना भी आसान है।
कठिन केवल एक काम है
उनकी तरह पढ़ना।
किसी बात को मानने से पहले सोचना।
अपने प्रिय नेता से प्रश्न करना।
भीड़ के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत रखना।
और सबसे कठिन
अपनी ही मान्यता गलत निकल जाए तो उसे बदल देना।
यह काम फेसबुक पर भगत सिंह की तस्वीर लगाने से नहीं होता।
इसमें मेहनत लगती है।
इसलिए भगत सिंह जी…
आज आप जहाँ हैं, वहीं रहिए।
हम आपकी प्रतिमा पर माला चढ़ा देंगे।
आपके नाम का नारा भी लगा देंगे।
सरकारी कार्यक्रम भी कर लेंगे।
दो मिनट मौन भी रख लेंगे।
बस आप सचमुच वापस आकर प्रश्न मत पूछ लेना।
क्योंकि अंग्रेजों से मिली स्वतंत्रता का हिसाब तो हम बहुत अच्छे से बता देंगे
अपने दिमाग की स्वतंत्रता का हिसाब देते समय थोड़ी कठिनाई हो जाएगी।
और शायद तब हमें यह भी समझ आए कि भगत सिंह का बलिदान व्यर्थ गया या नहीं, इसका निर्णय उनकी आत्मा नहीं करेगी।
यह निर्णय हमारा जीवन करेगा।
उन्होंने 23 वर्ष में अपना हिस्सा कर दिया।
हमने अपनी उम्र में क्या किया?
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