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*कश्यपसंहिता में वर्णित 3 हज़ार वर्ष पुराना आयुर्वेदिक टीकाकरण - स्वर्णप्राशन*

कश्यपसंहिता में वर्णित 3 हज़ार वर्ष पुराना

स्वर्णप्राशन

आयुर्वेदिक टीकाकरण - स्वर्णप्राशन

भारत की इस धरा ने - हमारी साँस्कृतिक परंपरा ने कई महापुरुषो, संतो, शूरवीरो, बौद्धिको, महान तत्ववेत्ताओ को जन्म दिया है। पर इस परंपरा को खडी करने और इतने सारे महान चरित्रो का संगोपन कैसे किया होगा यह हमने कभी सोचा है क्या? हमारे प्राचीन ऋषिओं ने इसके लिये अथाह परिश्रम उठाया है।

स्वर्ण यानि सोना (Gold) और प्राशन यानि चटाना।

बाल संस्कार जन्म से 12 वर्ष पुष्य नक्षत्र कश्यप संहिता
स्वर्णप्राशन
अगला पुष्य नक्षत्र
गणना हो रही है…

समाज स्वस्थ - निरोगी बने इसके लिये आज कई सामाजिक, धार्मिक संस्थान और खुद सरकार भी चिंतित और कार्यरत है। अरबो का बजट हमारे आरोग्य की रक्षा के लिये सरकार और अंतराष्ट्रीय संस्थाएँ खर्च करती है।

भिन्न-भिन्न प्रकार के केम्प, सहायता, जागृकता बढें इसके लिये विज्ञापन, फरजियात टीकाकरण द्वारा बहुत ही जोरो से प्रयत्न होता रहता है। कभी कभी इसके परिणामो की ओर दृष्टि करें तो प्रयत्न के समक्ष परिणाम बहुत ही अल्प मात्रा में दिखता है।

समाज में शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता बढी है, पर मानसिक स्वास्थ्य का क्या?

मानसिक रोग, निर्माल्य एवं असंस्कारी समाज अगर दीर्घायुष्य पाता है तो आशीर्वाद के बदले श्राप ही होगा। समग्र विश्व में सबसे प्राचीनतम और समग्र विश्व को मार्गदर्शन देने के साथ साथ आधुनिक विज्ञान को अति महत्वपूर्ण सिद्धांतो की भेंट करने वाले आयुर्वेद के सिद्धांत आज भी वैसे के वैसे ही प्रभावी है।

इसके सामने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में हर पाँच साल में उनकी मान्यता को खुद ही मिटाते है। पाँच साल पहले का अमृततुल्य औषध आज जहर बन जाता है। कभी बच्चे को माँ का दूध नहीं देना चाहिये ऐसा कहने वाले लोग ही वही "माँ का दूध अमृततुल्य है" यहाँ समझाने के लिये अरबो रुपयो का खर्च सरकार से करवाते है।

तो फिर, सही माने में स्वस्थ समाज कैसा होना चाहिये? इसकी कल्पना को हमारे प्राचिन ऋषिओ ने सिद्ध करके दिखाया है।

तब के हमारे आचार्यो का यहाँ स्पष्ट मानना था कि कानून से लायी गई क्रिया लम्बे अरसे तक टीक नही पाती, इसीलिए अगर कोई बात या संस्कार को सदीयों तक जीवंत रखना है तो उसको समझ के साथ और भाव के साथ रखना ही उचित माना जायेगा।

अतः आरोग्य की रक्षा की सभी बातो को हमारी परंपरा में, हमारे धार्मिक व्यवहार के भीतर और हमारे संस्कार के साथ साथ जोड दिया गया।

इसीलिए कई एसी बाते जो हमारी परंपरा में है, हम उसको भाव या बडो का मान रखने के लिये भी करते है, पर उसमे निहित आरोग्य का अद्भुत कारण हमारी समझ में से निकल गया है।

आज हमारे ऐसे ही एक संस्कार की बात समझने की कोशिश करने जा रहे है, वह है स्वर्णप्राशन संस्कार।

हमारे घर बालक का जन्म जब होता है तब उसके पश्चात डॉक्टर हमें बालक के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु भिन्न भिन्न समयावधि में टीका लगवाने (रसीकरण) का परामर्श देते है।

हमारे शरीर के अंदर भिन्न भिन्न रोगो का प्रतिकार करनेकी क्षमता यानि हमारी रोग प्रतिकार शक्ति (Immunity) ही हमें भिन्न भिन्न रोगों से बचाती है, जब यह शक्ति क्षीण होती है तब हम रोगग्रस्त हो जाते है।

यह क्षमता शरीर स्वयं ही उत्पन्न करने का प्रयास करता है, और स्वर्णप्राश उसमे सहयोग करता है।

हमारे आचार्यो ने इसी सिद्धांत पर हज़ारो वर्षो से कार्य किया हुआ था और आज के टीको की तरह किराये की immunity के स्थान पर शरीर स्वयं ही रोगो से लड़ने की क्षमता उत्पन्न कर सके जिसका एक ब्रह्मास्त्र ढूँढ निकाला, "स्वर्णप्राश"।

✦

स्वर्ण ही क्यूँ?

स्वर्ण हमारे शरीर के लिये श्रेष्ठत्तम धातु है। न केवल बालको के लिए अपितु सभी आयुवर्ग के लिए उतनी ही असरकारक और रोगप्रतिकार क्षमता बढानेवाली है।

इसलिए तो हमारे जीवन व्यवहार में सदीयों से स्वर्ण का महत्व रहा है। उसकी हमारे शारीरिक और मानसिक विकास में अत्यधिक प्रभावशाली होने के कारण ही उसको शुभ मान जाता है, उसका दान श्रेष्ठ माना गया है।

हमारे पूर्वजो की स्पष्ट समझ थी कि, सोना हमारे शरीर में किसी भी प्रकार से जाना चाहिये! यही कारण है कि हमारे यहाँ शुद्ध सोने के गहने पहनने का व्यवहार है।

नकली गहने पहनने पर बुजुर्गो की डाँट भी पडती है। इसी कारण हमारे राजा और नगरपति - धनवान लोग सोने की थाली में ही खाना खाते थे, जिससे स्वर्ण घिसता हुआ हमारे शरीर के भीतर जाए।

सोने के गहने पहनना, सोना खरीदना, सोने का दान करना, सोने का संग्रह करना, सोने की थाली में खाना इन सभी बातों में हमारे आचार्यो का अति महत्वपूर्ण द्रष्टिकोण रहा था कि सोना शरीर में रोगप्रतिकार क्षमता तो बढाता ही है साथ-साथ हमारी मानसिक और बौद्धिक क्षमता भी बढाता है।

यह शरीर, मन एवं बुद्धि का रक्षण करने वाली अद्भुत धातु है। इसीलिए पूरी दुनिया की Economy स्वर्ण पर निर्भर है। यही उसकी हमारे जीवन में महत्ता का द्योतक है!!

ॐ

स्वर्णप्राश संस्कार कब और किसको?

स्वर्णप्राशन यह हमारे 16 संस्कारो में से एक है। हमारे यहाँ जब बालक का जन्म होता है तब उसको सोना या चांदी की शलाका (सली) से उसके जीभ पर शहद चटाने की या जीभ पर ॐ लिखने की एक परँपरा रही है।

स्वर्ण की मात्रा चटाना यानि स्वर्णप्राश। हम यह करते ही है पर हमें उसकी समझ नही है। यह कैसे आया और क्यों आया? इसका उद्देश्य और परिणाम क्या है यह हमें पता नही।

हज़ारो वर्षो बाद किसी भी रूप में आज तक इसका स्थापित रहना यह उपलब्धि है हमारे पूर्वजो की। उसके लिये हमारे आचार्यो ने कितना परिश्रम किया होगा, तब जाकर यह हम तक पंहुचा है।

स्वर्णप्राशन संस्कार

यह स्वर्णप्राशन, स्वर्ण के साथ साथ आयुर्वेद के कुछ औषध, गाय का घी और शहद के मिश्रण से बनाया जाता है।

यह जन्म के दिन से शुरु कर पूरी बाल्यावस्था या कम से कम छह महिने तक चटाना चाहिये।

अगर यह हमसे छूट गया है तो बाल्यावस्था के भीतर यानि 12 साल की आयु तक कभी भी शुरु करके इसका लाभ ले सकते है।

इसी हमारी परंपरा को पुष्टि देने के लिये बालक के नजदीकी लोग सोने के गहने या सोने की चीज ही भेंट करते है; शायद उस समय पर वो यही स्वर्णप्राशन ही भेंट करते होंगे।

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स्वर्णप्राशन के लाभ

आयुर्वेद के बालरोग के ग्रंथ कश्यप संहिता के पुरस्कर्ता महर्षि कश्यप ने स्वर्णप्राशन के गुणों का निरूपण किया है..

सुवर्णप्राशन हि एतत मेधाग्निबलवर्धनम् ।
आयुष्यं मंगलमं पुण्यं वृष्यं ग्रहापहम् ॥
मासात् परममेधावी क्याधिभिर्न च धृष्यते ।
षडभिर्मासै: श्रुतधर: सुवर्णप्राशनाद् भवेत् ॥
सूत्रस्थानम्, कश्यपसंहिता

अर्थात्, स्वर्णप्राशन मेधा (बुद्धि), अग्नि (पाचन अग्नि) और बल बढानेवाला है।

यह आयुष्यप्रद, कल्याणकारक, पुण्यकारक, वृष्य (पदार्थ जिससे वीर्य और बल बढ़ता है), वर्ण्य (शरीर के वर्ण को तेजस्वी बनाने वाला) और ग्रहपीडा को दूर करनेवाला है।

स्वर्णप्राशन के नित्य सेवन से बालक एक मास में मेधायुक्त बनता है और बालक की भिन्न भिन्न रोगो से रक्षा होती है। वह छह मास में श्रुतधर (सुना हुआ सब याद रखनेवाला) बनता है, अर्थात उसकी स्मरणशक्त्ति अतिशय बढती है।

यह स्वर्णप्राशन पुष्यनक्षत्र में ही उत्तम प्रकार की औषधो के चयन से ही बनता है। पुष्यनक्षत्र में स्वर्ण और औषध पर नक्षत्र का एक विशेष प्रभाव रहता है।

स्वर्णप्राशन से रोगप्रतिकार क्षमता बढने के कारण उसको वायरल और बेक्टेरियल इंफेक्शन से बचाया जा सकता है।

यह स्मरण शक्ति बढाने के साथ साथ बालक की पाचन शक्ति भी बढाता है जिसके कारण बालक पुष्ट और बलवान बनता है। यह त्वचा को निखारता भी है।

इसीलिए अगर किसी बालक को जन्म से 12 साल की आयु तक स्वर्णप्राशन देते है तो वह उत्तम मेधायुक्त बनता है और कोई भी बिमारी उसे जल्दी छू नही सकती।

स्वर्णप्राशन

सही मात्रा और औषध से बना हुआ स्वर्णप्राशन अगर किसी भी बालक को नियमित रूप से दिया जाये तो वह "श्रुतधर" मतलब कि एक बार सुना हुआ उसको याद रह जाता है।

अगर हम इसको आज के परिप्रेक्ष्य में समझे तो उसकी स्मरणशक्ति अवश्य ही बढती है।

स्वस्थ और तेजस्वी भारत के निर्माण में यह संस्कार हमारे लिये एक बहुत ही महत्वपूर्ण साधन है।

इसके लिये 12 साल तक की उम्र के किसी बालक को कभी भी शुरु करवा सकते है। इसके लिये प्रतिमाह आने वाले पुष्यनक्षत्र से ही देना आरम्भ से यह बहुत ही लाभप्रद रहता है।

रोगप्रतिकार क्षमता बालक की रोगप्रतिकार क्षमता बढती है, जिसके कारण अन्य बालको की तुलना वह कम से कम बिमार होता है। इस प्रकार स्वस्थ रहने के कारण उसको एन्टिबायोटिक्स या अन्य दवाईया देने की जरूरत न रहने से हम बचपन से ही इनके दुष्प्रभाव से बचा सकते है।
शारीरिक विकास स्वर्णप्राशन बालक के शारीरिक विकास में सकारात्मक गति लाता है।
स्मरण एवं धारण शक्ति यह स्वर्णप्राशन स्मरणशक्ति और धारणशक्ति (grasping ability) बढाने वाले कई महत्वपूर्ण औषध से बना है।
चपलता एवं बुद्धि शारीरिक और मानसिक विकास के कारण वह ज्यादा चपल और बुद्धिमान बनता है।
पाचन शक्ति पाचनक्षमता बढाता है जिसके कारण उसको पेट और पाचन संबंधित कोई तकलीफ़ एवं पोषक तत्वों की कभी कमी नही रहती।
भारतीय संस्कार भारतीय संस्कृति के 16 संस्कारो में से एक यहाँ संस्कार की महत्ता को समझकर अपने बच्चो को श्री कृष्ण जैसा तेजस्वी बनाने का प्रण करें, उन्हें स्वर्णप्राशन भेंट करें।

हमारे स्वर्णप्राशन की विशेषता

संस्कृति आर्य गुरुकुलम एवं वीरेंद्र गौधूली परिवार के मेल से निर्मित यह स्वर्णप्राशन महर्षि कश्यप द्वारा अपने ग्रंथ कश्यप संहिता में बताये हुए सभी औषध और शास्त्रानुसार पूर्ण मात्रा में स्वर्ण के संयोजन से केवल पुष्यनक्षत्र में बनाया जाता है। जिसमे कारण हमे देश भर में अद्भुत परिणाम मिल रहे है।

!

कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु

स्वर्णप्राशन आजकल बाजार में भी कई फार्मसी और लोग केवल व्यपारिक दृष्टिकोण से जिसमे शुभ-लाभ नहीं केवल लाभ की भावना निहित है भी पिलाते है।

वह लोग महीने में केवल एक ही दिन अर्थात पुष्यनक्षत्र के दिन या उनकी अनुकुलता के अनुसार किसी भी दिन पिलाते है।

उसके संदर्भ में स्वर्णप्राशन की गुणवत्ता के संदर्भ में आपको कभी भी संदेह न हो इसलिये कुछ स्पष्टताएँ करना मुझे जरूरी लगता है..

केवल महीने में एक बार पिलाने से कभी उपरोक्त श्लोक के अनुसार लाभ मिलना संभव नहीं है अर्थात स्वर्णप्राशन पुष्यनक्षत्र को पिलाना आवश्यक तो है परन्तु पर्याप्त नहीं।

आयुर्वेद के औषध की असरकारकता उसकी गुणवत्ता और निर्माण विधि पर ही आधारित है।
स्वर्णप्राशन दिन में किसी भी समय केवल एक ही बार देना है और उसको फ्रीज में रखने कि जरुरत नही है। यह किसी भी बिमारी मेँ किसी भी औषधे के साथ भी ले सकते है।
अगर आप आपके बालक को या अपने स्नेही के बालक को जन्म समय से देना चाहते हो तो गर्भावस्था के अंतिम महिने में मँगवाकर रखे और जन्म से ही शुरु करें।

स्वर्णप्राशन देने की विधि

यदि जन्म से बच्चे को कोई टीका नही लगवाया है तो जन्म से ही आरम्भ कर सकते है।

और यदि किसी भी कारण से आप उसको टीके देने पड़ रहे है तो मंत्रौषधि स्वर्णप्राश देने का शुभारम्भ करें तथा 6 महीने के बाद प्रतिदिन नीचे दी गई खुराक के अनुसार देना है।

यदि बच्चे को बुखार हैं और उसे एलोपैथी की दवाई दी जा रही है तो भी उसे बुख़ार पूरी तरह से उतरने के बाद ही मंत्रौषधि स्वर्णप्राश दें।

मंत्रौषधि स्वर्णप्राशन का नियमित सेवन खाली पेट करना चाहिए। यदि कुछ खाया है तो 15 मिनट बाद सेवन करें।

बालक को प्रातः उठाकर स्नान आदि से शुद्ध कर शीशी पर लिखी मात्रा या वैद्य के निर्देशानुसार नीचे दिए गए वेदोक्त मन्त्र का पाठ करके आयु के अनुसार स्वर्णप्राशन का सेवन अधिक लाभकारी होता है।

स्वर्णप्राशन संस्कार का मन्त्र
ॐ भू: त्वयि दधामि
ॐ भुवः त्वयि दधामि
ॐ स्वः त्वयि दधामि
ॐ भूः भुवः स्वः त्वयि दधामि
अर्थात

हे वत्स! तुम्हे तेज प्राप्त हो
हे वत्स! तुम्हे प्रभाव सत्ता प्राप्त हो
हे वत्स! तुम्हे ओज प्राप्त हो
•

आयु के अनुसार मात्रा

प्रतिदिन देने की मात्रा
ध्यान रहे नीचे दी गई मात्रा प्रतिदिन देने के अनुसार है।
0 से 6 माह
हर 7 से 15 दिन में 2 बूँद
6 माह से 8 वर्ष
1 बूँद से प्रारम्भ कर 6 बूँद तक प्रतिदिन
8 से 12 वर्ष
7 बूँद प्रतिदिन
केवल पुष्य नक्षत्र पर देने की मात्रा
ध्यान रहे नीचे दी गई मात्रा यदि आप महीने में एक बार अर्थात केवल पुष्यनक्षत्र पर ही दे रहे है उसके अनुसार है।
0 से 6 माह
3 बूँद
6 माह से 8 वर्ष
5 बूँद
8 से 12 वर्ष
7 बूँद

पुष्य नक्षत्र 2026 — पूरी सूची

समय भारतीय मानक समय (IST) के अनुसार

अगली अभी
4 जनवरी 2026
4 जनवरी 3:11 PM से 5 जनवरी 1:25 PM
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1 फरवरी 2026
1:34 AM से 11:58 PM
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28 फरवरी 2026
28 फरवरी 9:35 AM से 1 मार्च 8:34 AM
अगली अभी
27 मार्च 2026
27 मार्च 3:24 PM से 28 मार्च 2:50 PM
अगली अभी
23 अप्रैल 2026
23 अप्रैल 8:57 PM से 24 अप्रैल 8:14 PM
अगली अभी
21 मई 2026
21 मई 4:12 AM से 22 मई 2:49 AM
अगली अभी
17 जून 2026
17 जून 1:37 PM से 18 जून 11:32 AM
अगली अभी
15 जुलाई 2026
12:09 AM से 9:46 PM
अगली अभी
11 अगस्त 2026
11 अगस्त 10:09 AM से 12 अगस्त 7:59 AM
अगली अभी
7 सितम्बर 2026
7 सितम्बर 6:14 PM से 8 सितम्बर 4:39 PM
अगली अभी
5 अक्टूबर 2026
12:13 AM से 11:09 PM
अगली अभी
1 नवम्बर 2026
1 नवम्बर 5:39 AM से 2 नवम्बर 4:30 AM
अगली अभी
28 नवम्बर 2026
28 नवम्बर 12:50 PM से 29 नवम्बर 10:59 AM
अगली अभी
25 दिसम्बर 2026
25 दिसम्बर 10:50 PM से 26 दिसम्बर 8:12 PM
ध्यान दें: पंचांग के समय में स्थान के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है। किसी विशेष समय का पालन करना हो तो अपने स्थान के पंचांग से भी पुष्टि कर लें।

मंत्रौषधि स्वर्णप्राशनं

गौधूली पर स्वर्णप्राशन 15ml और 30ml मात्रा में उपलब्ध है। अपनी आवश्यकता के अनुसार मात्रा चुनकर सीधे ऑर्डर कर सकते हैं।

✓ 15ml एवं 30ml विकल्प
✓ पुष्य नक्षत्र तथा प्रतिदिन प्रयोग के लिए
✓ सीधे Gaudhuli.com से ऑर्डर
स्वर्णप्राशन उपलब्ध है

आवश्यक मात्रा चुनने के लिए उत्पाद पृष्ठ खोलें।

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एक शीशी कितने दिन चलेगी?

खुराक के अनुसार प्रतिदिन देने के लिए एक शीशी लगभग 15 दिन से एक महीना चलेगी।

यह शीशी 15 ml और 30 ml में आती है।

स्वर्णप्राशन की एक दिन की खुराक का बाजार में स्वर्ण के अनुसार ऊँचा दाम लिया जाता है। जिस कारण प्रतिदिन देने का साहस कोई नही दिखा पाता। परंतु कुछ संतो के आशीर्वाद से अधिक बच्चो को स्वर्णप्राशन की खुराक मिले। अतः यह अमृतुल्य औषधि बाज़ार भाव कम मूल्य पर उपलब्ध है।

प्रश्न: हम अपने बच्चे को प्रतिदिन नही केवल पुष्यनक्षत्र के दिन स्वर्णप्राशन देते है क्या यह सही है?

उत्तर: पुष्यनक्षत्र पर स्वर्णप्राशन आवश्यक अवश्य है परंतु पर्याप्त नही। अतः प्रयास करे की 12 वर्ष की आयु तक प्रतिदिन इसे पिलाएं।

स्वर्णप्राशन आंदोलन से जुड़े!

प्रण लें की आप अपने परिचय के कम से कम 10 परिवारो के बच्चो को स्वर्णप्राशन पिलाने के लिए प्रेरित करेंगे।

जो निश्चित ही उनके मन, मस्तिष्क और स्वास्थ्य को सँवार कर अद्भुत परिणाम देगा।

बच्चो के अच्छे स्वास्थ्य हेतु उन्हें

  • स्वर्णप्राशन दें।
  • सुई (रसिकरण) लग गई है तो उसके दुष्प्रभावों को निष्क्रिय करने के लिए अमृत-प्राशनम दें।
  • गुरुकुल प्रभात आश्रम द्वारा निर्मित बालपाल रस प्रतिदिन पिलाये।
  • हमारे द्वारा मिटटी के पात्रो में निर्मित नासिका प्रतिदिन बच्चो की नाभि और नाक में डाले।

मंत्रौषधि स्वर्णप्राशनं

आवश्यकता के अनुसार 15ml या 30ml मात्रा चुनें।

वीरेन्द्र गौधूली
Gaudhuli.com
info@Gaudhuli.com
संपर्क: 9873410520
Described in Kashyap Samhita

Swarnprashan

An ancient Ayurvedic child-care tradition

The original Hindi article discusses Swarnprashan as an ancient Indian samskara associated with childhood, gold, Ayurvedic herbs, ghee, honey and Pushya Nakshatra.

Swarna means Gold and Prashan means administering or licking.

Child Samskara Birth to 12 Years Pushya Nakshatra Kashyap Samhita
Swarnprashan
Next Pushya Nakshatra
Calculating...

The original article explains Swarnprashan in the context of the Indian samskara tradition and discusses the importance placed on physical, mental and intellectual development in classical Ayurvedic thought.

It describes immunity as the body's capacity to resist disease and presents Swarnprash as a traditional practice intended to support the child's development.

What kind of society can truly be called healthy — only physically healthy, or mentally and intellectually healthy as well?
✦

Why Gold?

The article discusses the traditional importance of gold in Indian life and explains why it became associated with auspicious occasions, jewellery, gifting and various samskaras.

It presents Swarnprash as a preparation combining gold with selected Ayurvedic ingredients, ghee and honey.

ॐ

When is Swarnprash Given?

The article describes Swarnprash as a childhood samskara. It states that it may be started during childhood and discusses its use up to the age of 12 years.

It also connects the preparation of Swarnprash with Pushya Nakshatra.

सुवर्णप्राशन हि एतत मेधाग्निबलवर्धनम् ।
आयुष्यं मंगलमं पुण्यं वृष्यं ग्रहापहम् ॥
मासात् परममेधावी क्याधिभिर्न च धृष्यते ।
षडभिर्मासै: श्रुतधर: सुवर्णप्राशनाद् भवेत् ॥
Kashyap Samhita
Medha Traditionally described in relation to intellect, memory and grasping ability.
Bala Traditionally discussed in relation to strength and development.
Agni The article associates the practice with digestive strength.
Smriti The traditional description includes memory and retention.
●

Method and Mantra

The original article recommends following the quantity written on the bottle or the directions of a Vaidya.

It also describes reciting the traditional mantra while administering Swarnprash.

Swarnprashan Samskara Mantra
ॐ भू: त्वयि दधामि
ॐ भुवः त्वयि दधामि
ॐ स्वः त्वयि दधामि
ॐ भूः भुवः स्वः त्वयि दधामि
May the child receive Tejas.
May the child receive strength and influence.
May the child receive Ojas.
•

Quantity by Age

Daily Schedule
These quantities reproduce the daily schedule given in the original article.
Up to 6 months
2 drops every 7–15 days
6 months–8 years
Start with 1 drop, up to 6 drops daily
8–12 years
7 drops daily
Pushya-Only Schedule
These quantities apply when Swarnprash is given only once a month on Pushya Nakshatra.
Up to 6 months
3 drops
6 months–8 years
5 drops
8–12 years
7 drops

Pushya Nakshatra 2026 — Complete List

Indian Standard Time (IST)

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4 January 2026
4 Jan, 3:11 PM – 5 Jan, 1:25 PM
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1 February 2026
1:34 AM – 11:58 PM
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28 February 2026
28 Feb, 9:35 AM – 1 Mar, 8:34 AM
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27 March 2026
27 Mar, 3:24 PM – 28 Mar, 2:50 PM
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23 April 2026
23 Apr, 8:57 PM – 24 Apr, 8:14 PM
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21 May 2026
21 May, 4:12 AM – 22 May, 2:49 AM
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17 June 2026
17 Jun, 1:37 PM – 18 Jun, 11:32 AM
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15 July 2026
12:09 AM – 9:46 PM
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11 August 2026
11 Aug, 10:09 AM – 12 Aug, 7:59 AM
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7 September 2026
7 Sep, 6:14 PM – 8 Sep, 4:39 PM
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5 October 2026
12:13 AM – 11:09 PM
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1 November 2026
1 Nov, 5:39 AM – 2 Nov, 4:30 AM
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28 November 2026
28 Nov, 12:50 PM – 29 Nov, 10:59 AM
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25 December 2026
25 Dec, 10:50 PM – 26 Dec, 8:12 PM
Please note: Panchang timings may vary slightly by location. Verify with your local Panchang if precise local timing is required.

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वीरेन्द्र गौधूली | Virendra Gaudhuli
॥ भोजनम् औषधौ परिणमयतु ॥
Let Food be the Medicine

टिप्पणियाँ

  1. स्वरणप्रसन व अमृत्प्रासन मँगवाने क् लिए आपसे कैसे संपर्क करें

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. कृपया अपना पता, पिनकोड, लिखकर 9873410520 पर whatsapp भेजे

      हटाएं
  2. सुवर्णप्रसन व अमृत्प्रासन मँगवाने के लिए आपसे कैसे संपर्क करें और दूर होने क् कारण स्वास्थ संबंधित सलाह लेने के लिए कैसे संपर्क होगा। अगर कोई गंभीर बीमारी हो तो फिर वही अलोपैथी के चक्कर मे पर जाते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  3. स्वर्णप्रासन व अमृत्प्रासन मँगवाने के लिए आपसे कैसे संपर्क करें और दूर होने के कारण स्वास्थ संबंधित सलाह लेने के लिए आपसे कैसे संपर्क करें।

    जवाब देंहटाएं
  4. भारतीय संस्कृति की संवाहक कामधेनु स्वरूप गौमाता की प्रतिष्ठा के पुनर्स्थापना हेतु साधुवाद |

    जवाब देंहटाएं
  5. आपके इस जनकल्याण के कार्य की हम सराहना करते है

    जवाब देंहटाएं
  6. आयुर्वेद के दुर्लभ ज्ञान को प्रचार कर सामने लाना तो दूर दबाने का प्रयास किया गया है।

    जवाब देंहटाएं
  7. Esko sir bager honey ke banaye to mai lene ko ready hu, kyo ki ham honey nahi lete esliye, jab bhi aap banaye to mujhe 9822993143, bta digiye

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत ही अद्भुत कदम आप

    जवाब देंहटाएं
  9. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आप इस कार्य में बहुत आगे बेहतर करें

    जवाब देंहटाएं

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हिन्दी English आयुर्वेद • त्रिफला • 12 वर्ष का कल्प त्रिफला कल्प जानिए 12 वर्ष तक लगातार असली त्रिफला लेने की पारंपरिक विधि त्रिफला केवल कभी-कभार पेट साफ करने वाला चूर्ण नहीं माना गया। आयुर्वेद में इसे रसायन के रूप में भी स्थान मिला है। यहाँ त्रिफला का सही अनुपात, आयु के अनुसार मात्रा, ऋतु के अनुसार अनुपान, 12 वर्ष के कल्प और इसके अन्य पारंपरिक प्रयोगों को सरल और व्यवस्थित रूप में रखा गया है। हरड़ बहेड़ा आँवला घी शक्कर संग खाए हाथी दाबे कांख में और चार कोस ले जाए 1 कोस लगभग 3–4 किलोमीटर त्रिफला आखिर है क्या? आयुर्वेद के अनुसार हरड़, बहेड़ा और आँवला—इन तीन फलों के मिश्रण को त्रिफला कहा जाता है। परंपरागत आयुर्वेदिक दृष्टि में इसे वात, पित्त और कफ के संतुलन से जोड़कर देखा गया है। पुराने वर्णनों में त्रिफला को दीर्घकालीन पोषण और कायाकल्प से भी जोड़ा गया है। त्रिफला किस अनुपात में बनता है? अभ...

प्यास लगी थी गजब की…मगर पानी मे जहर था…

 प्यास लगी थी गजब की…मगर पानी मे जहर था… पीते तो मर जाते और ना पीते तो भी मर जाते. बस यही दो मसले, जिंदगीभर ना हल हुए!!! ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए!!! वक़्त ने कहा…..काश थोड़ा और सब्र होता!!! सब्र ने कहा….काश थोड़ा और वक़्त होता!!! सुबह सुबह उठना पड़ता है कमाने के लिए साहेब…।। आराम कमाने निकलता हूँ आराम छोड़कर।। “हुनर” सड़कों पर तमाशा करता है और “किस्मत” महलों में राज करती है!! दौलत की भूख ऐसी लगी कि कमाने निकल गए दौलत मिली तो हाथ से रिश्ते निकल गए बच्चो में रहने की फुरसत न मिली कभी फुरसत मिली तो बच्चे खुद कमाने निकल गए “शिकायते तो बहुत है तुझसे ऐ जिन्दगी, पर चुप इसलिये हु कि, जो दिया तूने, वो भी बहुतो को नसीब नहीं होता”.. अजीब सौदागर है ये वक़्त भी!!!! जवानी का लालच दे के बचपन ले गया…. अब अमीरी का लालच दे के जवानी ले जाएगा. …… लौट आता हूँ वापस घर की तरफ… हर रोज़ थका-हारा, आज तक समझ नहीं आया की जीने के लिए काम करता हूँ या काम करने के लिए जीता हूँ। “थक गया हूँ तेरी नौकरी से ऐ जिन्दगी मुनासिब होगा मेरा हिसाब कर दे…!!” भरी जेब ने ‘ दुनिया ‘ की पहेचान करवाई और खाली जेब ने ‘ अपनो ‘...

2003 से संसद में सभी कोल्ड ड्रिंक्स ब्रांड की बिक्री पर रोक है भारत में क्यों नहीं?

2003 से संसद में सभी कोल्ड ड्रिंक्स ब्रांड की बिक्री पर रोक है पूरे  भारत में क्यों नहीं? सरकारों का दोगलापन हमेशा से रहा है, सेवक बनकर दलाली ही की है अब अविवेकी और व्यवस्था के गुलाम लोग ऐसी दलील देंगे कि "कोल्ड ड्रिंक नहीं बेचेंगे तो देश का खर्चा कहाँ से चलाएगी बेचारी  सरकार?" हमारे एक साथी भाई अनूप पाण्डेय जी भारत सरकार से यह जानकारी ली तो चित्र में लिखे पत्र में जवाब मिला उसका हिंदी में अनुवाद इस प्रकार है . *********************************************************************** प्रश्न 1 सरकार द्वारा एक सांसद को कितनी प्रकार की सब्सिडी दी जाती है प्रश्न २ और भारत सरकार इन सब्सिडी पर कितना खर्च करती है उत्तर मिला : यह अस्पष्ट प्रश्न है और RTI एक्ट के अंतर्गत नहीं आता **************************************************************************** प्रश्न 3 क्या यह सत्य है की संसद की कैंटीन में कोक और पेप्सी पर रोक है अगर हां तो क्यों? उत्तर मिला: संसद परिसर में 6 अगस्त 2003 से सभी ब्रांड की कोल्ड ड्रिंक और सॉफ्ट ड्रिंक की पूर्ती और बिक्री पर रोक है, यह निर्णय संसद परिसर में भोज...