वैसे तो सोचकर देखो तो हमारी उम्र भी यह कहने की हो गई कि "हमारे जमाने में ऐसा होता था वैसा होता था" लेकिन सच में बहुत बढ़िया था जो भी था... खुद ही स्कूल जाना पड़ता था क्योंकि साइकिल बस आदि से भेजने की रीत नहीं थी, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे... उनको किसी बात का डर भी नहीं होता था, * पास/नापास यही हमको मालूम था... % कितने परसेंट नंबर आए? से हमारा कभी भी संबंध ही नहीं था... ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको ढपोर शंख समझा जा सकता था... किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थी... * कपड़े की थैली में...बस्तों में..और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में... किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी.. .. * हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर रद्दी पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम... एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था..... * साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की प...
आने वाली पीढ़ियों को समर्पित