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कुछ पुरानी भावुक यादें....!

  कुछ पुरानी भावुक यादें.... हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या मूत्र करने की स्थिति में होता था तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके, यह आम चलन था। हमने यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देख हुई हैं। जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना उन महान पुरखों में जन्मजात होती थी जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं। यह सब अभी 25-30 वर्ष पूर्व तक होता रहा है। उस जमाने का देसी घी यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि आज कई हज़ार रुपये किलो तक बिक सकता है। उस देसी घी को किसान विशेष कार्य के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को पिलाता था। टटीरी नामक पक्षी अपने अंडे खुले खेत की मिट्टी पर देती है और उनको सेती है। हल चलाते समय यदि सामने कहीं कोई टटीरी चिल्लाती मिलती थी तो किसान इशारा समझ जाता था और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ देता था। उस जमाने में आधुनिक शिक्षा नहीं थी। सब आस्तिक थे। दोपहर को किसान, जब आराम करने का समय होता तो सबसे पहले बैलों को पानी पिलाकर चारा ड...

टीके से मृत्यु का 2 सप्ताह में तीसरा मामला ! टीकाकरण के बाद कानपुर में दो बच्चों की मौत से मचा हड़कंप, सीएमओ ने स्टाॅक सील कर दिए जांच के आदेश

टीके से मृत्यु का 2 सप्ताह में तीसरा मामला  ****************************************** दुनिया में एक माता की गोद में अपने हँसते खेलते बच्चे के शव से बड़ा दुःख शायद ही कोई और हो  जिस बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य की कामना से सरकार द्वारा चलाये जा रहे तथाकथित स्वास्थ्य अभियान पर विश्वास कर अपने बच्चो को इन सरकारी चमचो के हाथो में सौंप कर क्या पता था कि बच्चा न तो स्वस्थ मिला न बीमार मिला वह मृत्यु को ही मिला  जब यह सरकारी गुलाम टीके न लगवाने पर माता-पिता से लिखित में मांगते है की यदि टीके न लगाने के कारन बच्चे को कुछ बीमारी हुई तो ज़िम्मेदार माता-पिता होंगे।  अब इस सरकारी तंत्र से पूछो की अपने बच्चे की भलाई माता पिता बेहतर सोचे सकते है या ये सरकारी नौकर जिन्हे ऊपर से आदेश पर बिना बुद्धि के टारगेट पूरा करने की  जल्दी होती है लेकिन अब जब टीके लगने के बाद बच्चे की मृत्यु हो गई अब किसकी ज़िम्मेदारी है? लेकिन नहीं नियम कानून तो सब इनकी संपत्ति है जैसे भी हो तोड़ मरोड़ कर हमें चुप करवा देंगे  अभी के लिए तो हर एक ऐसे समाचार को अधिक से अधिक आग की तरह फैलाएंगे लेकिन हम चुप नहीं...

श्रीराम मंदिर पर अपनी चुप्पी तोड़ता हूँ!

  श्रीराम मंदिर पर अपनी चुप्पी तोड़ता हूँ  इस कंगाली भरी नकली दीपावली का ठीकरा प्रधानसेवक के सिर फोड़ता हूँ  राम मंदिर की आधारशिला का उत्सव मनाऊँगा जी भर कर, सोचा था  आतिशबाजी, दीपक, मिठाई से उत्सव मनाऊंगा जी भर कर, सोचा था  क्या देख कर हर्ष मनाऊ? मुँह पर गुलामी का कपड़ा या  सड़को पर कोरोना का नकली झगड़ा या  अकारण मरते लोग सोचा था कि 1992 में शुरू हुई लड़ाई आज गंतव्य तक पहुंची है  उठी थी जो गोधरा में कारसेवको की चीत्कार आज गंतव्य तक पहुंची है  ईंटो पत्थर और भावना से राम लला का मंदिर तो बन जायेगा  मन मंदिर में राम के आदर्शो का पालन शायद ही कोई कर पाएगा राजनीति की रोटी सेक रहे है गरीबो के ठंडे चूल्हो पर  आनंद लूट रहे है नेता खाली पड़े सावन के झूलो पर  न तो सन्यासी हो न ही गृहस्थ आश्रमी तुम बन पाए  स्वयं को इतिहास में अमर  करने की भूख लेकर आएं  प्रधानसेवक बन देश को बेचने के सौदे तुम कर आएं  भूल जाऊंगा तुम्हारे सब पाप मान जाऊंगा की सर्वश्रेष्ठ हो आप  बस एक काम ढंग का कर दो  पूरी कर दो एक ब्राह्मण की यह मांग...

यह कैसी संक्रामक बीमारी है?

चेतावनी : जिनके पास दिमाग नहीं है यह पोस्ट उनके लिए नहीं है अब दिमाग लगाकर सोचिए  - अगर कोरोना संक्रामक बीमारी है : तो परिंदे और जानवर को अभी तक कैसे नहीं हुआ ? - यह कैसी बीमारी है जिसमें  सरकारी लोग  और हीरो ठीक हो जाते हैं और आम जनता मर जाती है ..? ********* -  कोई भी घर में या रोड पर तड़प कर नहीं मरता  हॉस्पिटल में ही क्यों मौत आती है..? ********* -  यह कैसी संक्रामक बीमारी है  कोई आज पॉजिटिव है  तो कल बिना इलाज कराए नेगेटिव हो जाता है..? ********* -   कोरोना संक्रामक बीमारी है जो जलसे में / रैली में/ और लाखों के प्रोटेस्ट में नहीं जाता, लेकिन गरीब नॉर्मल खांसी चेक कराने जाए तो 5 दिन बाद लाश बनकर आता है..? ********* -  गजब का कोरोना वायरस है  जिस की कोई दवा नहीं बनी फिर भी लोग 99% ठीक हो रहे हैं ? ********* -  यह कौन सी जादुई बीमारी है?  जिसके आने से सब बीमारी खत्म हो गई, अब जो भी मर रहा है कोरोना से ही मर रहा है.??? *********  जरा सोचिये  -  यह कैसा कोरोना है?  हॉस्पिटल में गरीब आदमी के  जिस्म ...

सूर्य ग्रहण में सूतक के नियम एवं जानकारियाँ

21 जून, 2020 का सूर्य ग्रहण आज के कुछ तथाकथित वैज्ञानिकता वाले युग जीने का दम्भ भरने वाले लोग इन सब बातो को अन्धविश्वास की दृष्टि से देखेंगे परन्तु इन सब नियमो के पीछे पूरी तरह विशुद्ध प्राचीन विज्ञान छिपा है  जिसे साधारण जनमानस को पालन करने हेतु साधारण भाषा में पाप आदि से जोड़ दिया गया है अतः हमारे पूर्वजो ने जिन पद्दतियों की नींव डाली थी वह भले ही आज अन्धविश्वास लगे परन्तु उनका शुद्ध रूप में पालन हमारे समाज एवं स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही होगा।   पहले के भारत के लोगो ने कभी नहीं कहा की वो वैज्ञानिक युग में जी रहे है परन्तु उनका जीवन पूरी तरह से वैज्ञानिकता से परिपूर्ण था आज के समय में हर दूसरा व्यक्ति विज्ञान की दुहाई देता है परन्तु सबका जीवन पूरी तरह से अवैज्ञानिक है  21 जून, 2020 का ग्रहण वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा।  इसका परिमाण 0.99 होगा।  यह पूर्ण सूर्यग्रहण नहीं होगा क्योंकि चन्द्रमा की छाया सूर्य का मात्र 99% भाग ही ढकेगी।  आकाशमण्डल में चन्द्रमा की छाया सूर्य के केन्द्र के साथ मिलकर सूर्य के चारों ओर एक वलयाकार आकृति बनाय...

घी क्यों और कितना खाएं? - इस विषय पर संक्षिप्त परन्तु तृप्त करने योग्य जानकारी।

घी क्यों और कितना खाएं? इस विषय पर संक्षिप्त परन्तु तृप्त करने योग्य जानकारी। चाय, हृदय रोगी, मोटापा, जोड़ो के दर्द से मुक्ति सुंदर त्वचा के इक्छुक अवश्य पढ़ें बिना घी की रोटी खाने वालों आपको मुर्ख बनाया गया है, जानिए .....सच्चाई क्या है दोस्तों, हर घर से एक आवाज जरुर आती है, “मेरे लिए बिना घी की रोटी लाना”, आपके घर से भी आती होगी, लेकिन घी को मना करना सीधा सेहत को मना करना है। लोगो तला हुआ या चिकनाहट वाले भोजन में अंतर नही पता अतः वह घी से दूरी बना लेते है। पहले के जमाने में लोग सामान्य दिनचर्या में घी का निसंकोच प्रयोग करते थे। इस लेख में घी का अर्थ है देसी गाय का वैदिक विधि से बिलोने से बना शुद्द देशी घी। मलाई से या किसी और शॉर्टकट से बना घी जैसा पदार्थ घी नही है। घी को अच्छा माना जाता था और कोलेस्ट्रोल और हार्ट अटैक जैसी बीमारियाँ कभी सुनने में भी नही आती थी। लेकिन फिर आरंभ हुआ घी का योजनाबद्ध नकारात्मक एवं गलत प्रचार। बड़ी बड़ी विदेशी कंपनियों ने डॉक्टरों के साथ मिलकर अपने बेकार और अनावश्यक उत्पादों का बाजार खड़ा कराने के लिए लोगों में घी के प्रति भ्रम फैलाया और कहा कि "घी से मोटा...

लोकल नही स्वदेशी वो भी उचित औऱ पूर्ण स्वदेशी!

लोकल नही स्वदेशी वो भी उचित औऱ पूर्ण स्वदेशी           कुछ दिन पहले "उचित स्वदेशी" के शीर्षक वाली एक पोस्ट डाली थी, जिसमे सभी देशवासियों से निवेदन किया था कि स्वदेशी सामान का माध्यम भी स्वदेशी हो तो ही उचित है कोरोना के बाद भी यदि हम भारतवासियों की आँखें न खुली तो भारत क़र्ज़ के ऐसे दुष्चक्र में फँस जायेगा जिसको चुकाते चुकाते हमारी आने वाली पीढ़ियां पूर्ण आर्थिक गुलामी में फस जाएगी।      मैंने यह भी लिखा था कि हो सकता है वर्तमान आर्थिक संकट से निपटने के लिए सरकार बड़े बड़े आर्थिक सहायता पैकेज देश को दें परन्तु वह मुख्यतः लोन के माध्यम से ही मिलेगा और यह क़र्ज़ जो किसी नेता को अपनी जेब से नहीं अपितु भारत की प्रजा को ही चुकाने है उसके लिए जापान की तरह स्वावलम्बी बनने का पहला चरण उचित स्वदेशी के माध्यम से ही मिलेगा।      हमारे मोदी जी द्वारा कल दिए राष्ट्र के नाम सन्देश में कुछ नया नहीं लगा जो आशा थी।  वही उन्होंने कहा परन्तु सबसे दुःखद लगा की उन्होंने स्वदेशी शब्द एक बार भी प्रयोग नहीं किया और केवल लोकल शब्द का प्रयोग किय...