बिकती बोतल देख के दी गंगाजी रोय।



बिकती बोतल देख के दी गंगाजी रोय।
पुण्य कमाने आयो थो पर नोट कमा गयो कोय।।
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गंगा जी के किनारे की दुकान और होटल पर बिकती मिनरल वाटर की बोतल को देखता हूँ तो पता नही क्यों वो बोतल व्यंगात्मक शैली में हम पर हँसती हुई दिखाई देती है!

और फिर न जाने उसको खरीदने वाले Indians को देखकर मुझ जैसे भारतीय के चेहरे पर भी वही हँसी आ जाती है।

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अब यहां से उन लोगो के लिए लिख रहा हूँ जिनको यह पोस्ट समझ नही आएगी और वो वैज्ञानिकों के अनुसार प्रदूषित घोषित हो चुकी गंगा जी की रिपोर्ट का हवाला देते टिप्पणी करेंगे कि गंगा जी का पानी पीने योग्य नही बचा है। उनको बताना चाहता हूँ कि गंगा जी के किनारे लगे हैंडपम्प या नल से पानी पिया हो तो समझ जाओगे की मैं क्या कहना चाहता हूँ।

भरी धूप या प्यास में इस जल की शीतलता को अनुभव कर यह लगता है कि अमृत का स्वाद भी कुछ ऐसा ही होता होगा। जिनको यह अनुभव हुआ है वो समझ जायेंगे
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भ्रमित भारतीयों के भ्रम का भ्रमण
वीरेंद्र की की बोर्ड रूपी कलम से

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