चचा नेहरू

चचा नेहरू

बचपन से ही स्कूल में नेहरू के बारे में हमारे मस्तिष्क में एक छवि बनायीं है कि नेहरू एक बहुत ही महान व्यक्ति थे। कांग्रेस के द्वारा देश पर किये गए कई कुठाराघात में से एक यह भी था कि हमारे बालमन पर एक ऐसे व्यक्ति की छवि अंकित की जा रही थी जो सच्चाई से कोसो दूर थी। जिस से सदियों तक उसकी छद्म महानता पीढ़ीयो के मन पटल पर अंकित हो जाए।
इसका एक उदहारण मुझे याद आता है जब हमारी पुस्तक में एक पाठ नेहरू और शास्त्री जी के जीवनशैली के तुलनमात्मक अध्ययन के रूप में पढ़ाया जाता था। इसमें एक वाक्य मुझे अभी तक याद आता है की 
"शास्त्री जी की व्यवस्था भी अस्तव्यस्तता से निर्मित थी और नेहरू जी की अस्तव्यस्तता भी व्यवस्था से निर्मित थी"
और पाठ के अंत में उत्तर में हमे इसके उत्तर रटाये जाते थे की ऐसा क्यों था और फिर हम अनजाने में यही याद करते थे जिसका भाव यही था की नेहरू जी व्यवस्थित थे जबकि शास्त्री जी अव्यवस्थित।



नेहरू को धैर्य और शांति का प्रतीक प्रमाणित करते हुए एक और उदहारण में नेहरू किसी विमान में बैठे है और तकनीकी गड़बड़ी के कारण विमान दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में आ गया परन्तु नेहरू इतने बहादुर थे की वह शान्ति से बैठे रहे और विमान को कुछ नहीं हुआ। ऐसे ही एक गुब्बारे वाले से तपती धूम में उसके सकते गुब्बारे खरीद कर उसे एक गरीबो का मसीहा घोषित किया गया
इसी प्रकार उनकी दिनचर्या आदि का विस्तार से विवरण देकर आज भी बच्चो को उनके महानता के किस्से किताबो में उकेरे गए है और यह तो शुक्र है की कांग्रेस ने उन्हें देश का चाचा नेहरू ही घोषित करने तक ही सीमित किया नहीं तो उनके वश में होता तो वो उन्हें देश का पापा नेहरू भी घोषित कर देते।

आज तक इनके नाम से बाल दिवस मनाने का औचित्य समझ नहीं आया।  गुरु गोबिंद सिंह जी के दो पुत्र ज़ोरावर सिंह (9 वर्ष) और फ़तेह सिंह (6 वर्ष) ने अल्पायु में बहादुरी से 26 दिसंबर 1704 के शहादत दी। मेरे अनुसार इन दो महान आत्माओ की याद में ही बाल दिवस मनाना चाहिए।  
जब कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है तो यह यह आवश्यक नहीं की उसकी दिनचर्या प्रजा जाने उल्टा प्रजा की दिनचर्या प्रधानमंत्री को पता होनी चाहिए। इस प्रकार के स्वयं के गुणगान से कहीं उसी प्रकार की मानसिकता के शिकार हम भारतवासी हो गए है जिसमे जो प्रधानमंत्री करेगा वही आदर्श है जो की आवश्यक नहीं।
नेहरू द्वारा राजनीतिक फायदों के लिए देश के लोगो की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा देना एक गलत प्रकार का चलन का आरम्भ किया है जब धर्मपाल जी ने 1962 लड़ाई में चीन से हारने पर सभी सांसदों को एक खुला पत्र नेहरू के द्वारा लिए गलत निर्णयों की समीक्षा हेतु लिखा तो नेहरू ने व्यक्तिगत अहम् को ठेस पहुंचने के कारण धर्मपाल जी को इस आलोचनात्मक पत्र लिखने पर जेल में डाल दिया था।


जो लोग निर्णय से नाराज़ होकर अपने देश के प्रधानमंत्री को अपशब्द और भद्दी गालियां निकालते है उनको वो अवश्य ही कानून द्वारा सबक सिखाना चाहिए और इतने बड़े देश में सबकी सुनने लगेंगे तो सरकार शायद किसी निर्णय पर भी न पहुंच पाएं। परन्तु प्रजा को सभ्य शब्दों में मौखिक रूप से या लिखिति रूप से असंतुष्टि दर्शाने पर भी प्रतिबन्ध या कानूनी का डर सताने लगे तो ऐसे देश में प्रजा किसी भी सही या गलत के प्रति आवाज़ न उठाने की आदि हो जाती है और यह एक प्रगतिशील समाज की पहचान नहीं अपितु एक गुलाम प्रजा की पहचान है जो अंग्रेजी राज की यदि दिलाती है।
और जो राजा या आज पंत प्रधान अपने निर्णय की केवल प्रशंसा सुनने का आदि हो जाता है और अहम् के कारण आलोचना को सहन नहीं कर पाता उस देश का तो राम भी भला नहीं कर सकते।
- वीरेंद्र की कीबोर्ड रुपी कलम से

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