तिथि देवो भवः The Tale of Two Calendars






 तिथि देवो भवः 

उद्देश्य : विदेशी कैलेंडर को अपने व्यक्तिगत जीवन से निकालकर भारतीय पंचांग के अनुसार अपने जीवन को बिताना


और इस लेख को अपने जीवन में इस प्रण के साथ अपनाना की आज से अपने परिवार में कोई भी जन्मदिन आदि पर्व विदेशी कैलेंडर के अनुसार नहीं मानूँगा


क्योंकि इसका वैज्ञानिक आधार है

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आजादी के बाद हमने परतंत्रता के बहुत से चिह्न हटाए, सड़कों के नामों का भारतीयकरण किया, पर संवत् और राष्ट्रीय कैलेंडर के विषय में हम सुविधावादी हो गए


जहाँ एक और नेपाल जैसा देश का सरकारी कैलेंडर नेपाल संवत है वहां हमने कालगणना के लिए दुनिया के साथ चलने के नाम पर अपने राष्ट्रीय गौरव से समझौता कर लिया और सरकारी कामकाज के लिए अवैज्ञानिक ग्रेगरियन कैलेंडर को 1957 में सरकारी कैलेंडर की मान्यता दे दी


यह एक शर्म की बात है राष्ट्रीय गौरव के लिए


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इस अभियान से जुड़े कुछ प्रश्न


प्रश्न : तिथि देवो भवः अभियान क्यों आवश्यक लगा?


बड़े दुःख के साथ यह बात मन में आई की जो व्यक्ति स्वदेशी के लिए भारतीयता के लिए अपना जीवन बलिदान कर गया उस महान आत्मा राजीव दीक्षित जी का जन्मदिवस और पुण्यतिथि हम विदेशी कैलेंडर के अनुसार मनाते है


मुझे यह बर्दाश्त नहीं हुआ तो यह अभियान शुरू करने का विचार आया की इस साल से राजीव भाई और अपना और अपने परिवार में सभी का जन्मदिवस या कोई भी अन्य दिन केवल तिथि के अनुसार ही मानूँगा


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प्रश्न : तो अपनी दैनिक जीवन जो विदेशी कैलेंडर के अनुसार ही है उसे भारतीय पंचांग के अनुसार कैसे करे यह तो असंभव है ?


आज के युग में हमें अपने व्यवसाय आदि के अलावा घर में तिथि के अनुसार बच्चो के और अपने जन्मदिन मनाना, विवाह की वर्षगाँठ मनाने से कौन रोक सकता है


समय की मांग है तो विदेशी कैलेंडर को व्यवसाय तक सीमित कर दो घर के काम तो तिथि से हो सकते है


और इस प्रयत्न से जल्द ही सरकारी काम भी इसके अनुसार होने लगेंगे


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प्रश्न : तो विदेशी कैलेंडर से परहेज़ क्यों?


सत्य बात की जाये तो किसी का जन्म की तिथि उसकी पहचान होती है और अगर वो पहचान गलत तरीके से बनाये गए कैलेंडर के अनुसार हो तो कितना गलत है


अर्थात - आज का वर्ष 2015 है जिसका अर्थ है की कभी वर्ष 1, 2, 3 से यह गिनती शुरू हुई थी और यह गिनती ईसामसीह के जन्म से शुरू हुई थी


(इसे धर्म से जोड़ने की जगह विज्ञानं से जोड़ने का प्रयत्न करना)


तो मेरा यह मानना है की मैं अपने जन्म या किसी भी दिनांक को ईसा का जन्म से क्यों सम्बंधित करू इसीलिए नहीं की मैं हिन्दू हूँ लेकिन इसीलिए की यह अवैज्ञानिक है


कारण की जो Christian (Gregorian) कैलेंडर आज प्रचलित है वह पूर्ण रूप से अवैज्ञानिक है और इस कैलेंडर के द्वारा केवल और केवल गलत इतिहास और अन्धविश्वाश फैलाये गए है


केवल प्राचीन भारतीय कैलेंडर ही एकमात्र ऐसा कैलेंडर है जो पूरी तरह से वैज्ञानिक है


अधिक जानकारी के लिए यह विडियो देखें : The Tale of Two Calendars





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प्रश्न : लेकिन भारतीय कैलेंडर को प्रयोग करने से अब क्या फायदा?


फायदा है हमारी प्राचीन धरोहर जो पूरी तरह से सही और वैज्ञानिक है उसको जीवित रखना और अपने आने वाली पीढ़ी में जीवित रखना नहीं तो अपनी जड़ो को भूलने वाला पेड़ कभी भी लम्बा जीवित नहीं रहता सूख कर मर जाता है


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प्रश्न: लेकिन भारतीय कैलेंडर का प्रयोग कैसे सीखे वो तो बहुत मुश्किल है


शुरुआत के लिए यह वीडियो देखकर समझे 




बहुत आसान है आज के मोबाइल में एक App डाउनलोड कर लीजिये जिसका लिंक है


https://bit.ly/35z7n9S


और अगर लिंक न खुले तो Google Play में Hindu Calendar टाइप कर ढूंढ कर इंस्टाल कर लीजिये


यह आपको आपकी विदेशी डेट को भारतीय तिथि में बदल कर दिखा देगा


उदाहरण :


आप इसमें राजीव भाई के जन्मदिवस की तिथि भरिये जो है


30 नवम्बर 1967


जो भारतीय कैलेंडर के अनुसार यह होगा


कार्तिक महीने, कृष्ण पक्ष (बढ़ता चंद्रमा), चतुर्दशी


इसका मतलब यह की 2015 में यह दिन 10 दिसंबर 2015 के दिन पड़ेगा


उसी प्रकार राजीव भाई की पुण्यतिथि (30 नवम्बर 2015)


कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष की नवमी को है जो इस वर्ष 4 दिसम्बर 2015 को आयेगी


यह ठीक उसी तरह से है जैसे की हमारे यहाँ दिवाली, होली, राम नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, दशहरा, रक्षा बंधन सभी त्यौहार भारतीय कैलेंडर के अनुसार मनाये जाते है


और इसीलिए विदेशी कैलेंडर में इन त्योहारों का कोई निर्धारित दिन नहीं होता


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अधिक अध्ययन हेतु

https://bit.ly/3qeaMV1


पाश्चात्य नव वर्ष का इतिहास :


जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है।


इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया।


भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया। अधिकांश राष्ट्रों के ईसाई होने और अग्रेंजों के विश्वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे विश्व के अनेक देशों ने अपनाया।


1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से प्रारम्भ होता था किन्तु 18वीं सदी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेण्डर के महीनों के नामों में प्रथम छः माह यानि जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं।


जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये।


जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे इसलिए, दोनों ही इकत्तीस दिनों के माने गये अन्यथा कोई भी दो मास 31 दिनों या लगातार बराबर दिनों की संख्या वाले नहीं हैं।


ईसा से 753 वर्ष पहले रोम नगर की स्थापना के समय रोमन संवत् प्रारम्भ हुआ जिसके मात्र दस माह व 304 दिन होते थे।


इसके 53 साल बाद वहां के सम्राट नूमा पाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी दो माह और जोड़कर इसे 355 दिनों का बना दिया।


ईसा के जन्म से 46 वर्ष पहले जूलियस सीजन ने इसे 365 दिन का बना दिया।


सन् 1582 ई. में पोप ग्रेगरी ने आदेश जारी किया कि इस मास के 04 अक्टूबर को इस वर्ष का 14 अक्टूबर समझा जाये।


आखिर क्या आधार है इस काल गणना का? जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसा हाल था


वास्तव में यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।



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तो आज से तिथि को घर लाये और कहे


तिथि देवो भवः


निवेदक

वीरेंद्र सिंह

सह-संस्थापक 

Gaudhuli.com

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