मैकाले ने भारत को जो नुकसान पहुंचाया!





एक देश को आगे बढ़ने के लिए ऐसे लोगों की जरूरत होती है जिन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता पर गर्व हो। कट्टरवाद के विपरीत यही सच्चा राष्ट्रवाद है सब कुछ है। इसके लिए एक ऐसे बुद्धिजीवी वर्ग की भी आवश्यकता है जो अपने समाचार पत्रों, पुस्तकों, चित्रों, मूर्तियों और खेलों में इस गौरव को प्रदर्शित करे।

लेकिन इस तरह की समग्र उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए, एक देश को अपने समाज के जुड़े बुद्धिजीवियों की आवश्यकता होती है, जो अपनी जड़ों को जानते हैं, जो अपनी संस्कृति की पेचीदगियों, सूक्ष्मताओं और प्रतिभा को समझते हुए बड़े हुए है , परन्तु इसके दोषों के प्रति अंधे नहीं हैं। बुद्धिजीवियों वे हैं जो किसी राष्ट्र के मानस को आकार देते हैं।

भारत में, हम आम तौर पर पाते हैं कि यहाँ वहां बुद्धिजीवी मौजूद है, जो कि पश्चिमी बुद्धिजीवियों के बराबर या  श्रेष्ठ है। भारतीय बुद्धिजीवी अंग्रेजी में धाराप्रवाह हैं, इसे अंग्रेज़ो से भी बेहतर लिखते हैं, वे पश्चिमी साहित्य के जानकार हैं; वास्तव में, वे अक्सर कैमस, सार्त्र, फ्रायड और जंग को उद्धृत करते हैं; वे पश्चिम में नवीनतम रुझानों को जानते हैं, नवीनतम पुस्तकें पढ़ी हैं, और इस पृथ्वी पर किसी भी विषय पर बातचीत कर सकते हैं, चाहे वह पारिस्थितिकी हो या फैशन।

परन्तु दुर्भाग्य है की वे न केवल अपनी भारतीय संस्कृति से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं, बल्कि वे इसे नीची दृष्टि से भी देखते हैं। उन्हें न तो भगवद गीता, ध्यान, आयुर्वेद, या प्राणायाम की महानता के बारे में कोई जानकारी है  और न ही वे इसे चलाने के लिए अपनी प्रतिभा का सदुपयोग करते हैं, उल्टा उसको अपनी बुद्धि, अच्छी अंग्रेजी और एक गंदे और तीखी कलम के साथ नीचा दिखाने की का प्रयास करते है।   

ये सभी बुद्धिजीवी मैकाले नाम के एक व्यक्ति की देन हैं, जिसके पास 200 साल से भी अधिक समय पहले, न केवल भारत के मूल निवासियों को साहब में बदलने की सोच थी बल्कि उनको अंग्रेजों से अधिक ब्रिटिश बनाने का शानदार विचार था जिस से उन्हें अपनी संस्कृति, आध्यात्मिकता और संस्कारो पर शर्म महसूस हो। जब उन्होंने भारत पर अधिकार कर लिया, तो अंग्रेजों ने भारतीयों की एक मध्यस्थ श्रेणी की स्थापना की, जिसे वे मध्य स्तर के क्षेत्रों में अपना काम सौंप सकते थे और जो अंग्रेज़ो के लिए शासन करने के लिए सुविधाजनक उपकरण हो सकते थे। इन ब्रिटिश क्लोनों को आकार देने का उपकरण शिक्षा था।

भारत में ब्रिटिश स्कूली शिक्षा के पोप मैकाले के शब्दों में: "वर्तमान में हमें एक ऐसा वर्ग बनाने के लिए अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए, जो हमारे और उन लाखों लोगों के बीच दुभाषिया हो सकता है, जो खून और रंग में भारतीय है, लेकिन स्वाद में, राय में, नैतिकता में और बुद्धि में अंग्रेजी।" मैकाले का हिंदू संस्कृति और शिक्षा के लिए बहुत कम सम्मान था: उन्होंने कहा "सभी ऐतिहासिक जानकारी जो संस्कृत भाषा में लिखी गई पुस्तकों से एकत्रित की जा सकती है वह इंग्लैंड में बच्चो को पढ़ाये जानी वाली जानकारी की तुलना में पूरी तरह से व्यर्थ है ।" उन्होंने आगे कहा: "हिंदुओं के पास तुच्छ आंतरिक मूल्य का साहित्य है, जो नैतिकता के साथ शायद ही मेल खाता हो और भयंकर अंधविश्वासों से भरा है।"

आज ऐसा लगता है कि भारत के मार्क्सवादी बुद्धिजीवी मैकाले से पूरी तरह सहमत होंगे क्योंकि क्योंकि उसका सपना सच हो गया है: आज, इन भूरे साहबों के वंशज ही भारतीय और आध्यात्मिक शिक्षा के सबसे बड़े विरोधी है ; "धर्मनिरपेक्ष" राजनेता, पत्रकार, शीर्ष नौकरशाह, भारत की पूरी पश्चिमी ढंग में ढली जमात। और इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि उनमें से ज्यादातर हिंदू हैं!

यह वही लोग हैं जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त करने पर, भारत को उसकी वास्तविक पहचान से वंचित कर दिया और इस अद्वितीय भारतीय मानसिकता और मनोविज्ञान के अनुकूल बनाने की कोशिश किए बिना ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली का अंधानुकरण किया ; और ये ही वो लोग है जो पूरी तरह से पश्चिमि ढंग पर खड़ी भारत की शिक्षा प्रणाली में बदलाव को स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं, यह शिक्षा प्रणाली जीवन में किसी काम न आने वाले रटने वाले उबाऊ आंकड़ों को सीखा रही है जो ज्ञान व्यावहारिक जीवन में बहुत कम उपयोग की हैं।

और इस शिक्षा से भारत को जो मिल रहा है वह एक युवा है जो पश्चिमी ढंग के हैं: वे मैकडॉनल्ड्स जाते हैं, एमटीवी संस्कृति पर पनपते हैं, महंगी ब्रांडेड जींस और टी-शर्ट पहनते हैं, और सामान्य रूप से अमीर और अनुपयोगी परजीवी है, एक ऐसे देश में जहाँ बहुत सारे प्रतिभाशाली युवा हैं परन्तु वह गरीबी में रहते हैं। 

वे विकासशील दुनिया में लाखों अन्य पश्चिमी क्लोनों की तरह बड़े होंगे, जो टाई पहनते हैं, द न्यू यॉर्क टाइम्स पढ़ते हैं और शायद अपने देशों को कठिनाइयों से बचाने के लिए उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता की कसम खाते हैं। समय के साथ वही युवा ऊँचे पदों पर पहुँचेंगे और भारत का मज़ाक उड़ाने वाली किताबें और लेख लिखेंगे; वे मानवाधिकार समितियों की अध्यक्षता करेंगे; "धर्मनिरपेक्ष" उच्च नौकरशाह बनेंगे जो अपनी जड़ो से न जुड़े होने के कारण गलत निर्णय लेते हैं और आम तौर पर भारत को जबरदस्त नुकसान पहुंचाते हैं, क्योंकि यह उनके दिमाग में हमेशा अपने देश को नीचे चलाने के लिए प्रोग्राम किया गया है। संक्षेप में, वे हमेशा पश्चिम की ओर देखने वाले होंगे और हमेशा पश्चिमी दृष्टि के माध्यम से भारत को देखेंगे।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी बिल्कुल सही कहते थे कि भारतीय बच्चों को उनके अपने साहित्य के विशाल मानवीय और आध्यात्मिक मूल्यों के बारे में बताया जाना चाहिए, जैसे यूरोप में हम इलियड और ओडिसी, या महान ग्रीक त्रासदियों के मूल्यों के साथ पले-बढ़े हैं। इसलिए, भारत में शिक्षा का और अधिक भारतीयकरण करना होगा - यह "राष्ट्रवादी" या "भगवा उन्मुख" होने का सवाल नहीं है,  बल्कि अपनी संस्कृति, वेदों, भगवद गीता, रामायण, महाभारत को जानने का है जो वास्तव में, कई पश्चिमी विद्वानों के अनुसार आज तक के महानतम साहित्य रचनाओं में से एक है।  

साथ ही, यह सच है, जैसा कि श्री अरबिंदो ने कहा: "यद्यपि हमें भारत के लिए वह सब कुछ बचाना चाहिए जो उसने अपने प्राचीन अतीत में ज्ञान, चरित्र और महान विचारों के रूप में संग्रहीत किया है, हमें उसके लिए सबसे यूरोप का भी अच्छा ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए और उसे अपने विशिष्ट प्रकार के राष्ट्रीय स्वभाव में के अनुसार ढाल लेना चाहिए।  

दुर्भाग्य से, ऐसे समय में जब पश्चिम एंटीबायोटिक दवाओं से बीमार है और एक पद्धति जो इलाज से ज्यादा मारती है, आयुर्वेद के गुणों को फिर से खोज रही है, भारत में हर तीसरी दुकान एलोपैथिक नुस्खे बेचती है। जब पश्चिम, भौतिकवाद से बीमार स्वदेशी के गुणों को फिर से खोज रहा है, सरकारों द्वारा कोका कोला, मैकडॉनल्ड्स, या फोर्ड जैसी हज़ारो विदेशी कंपनियों को को भारत में खुली छूट दी गई है। जब पश्चिम हिंसा, अवसाद और तनाव के बीच आध्यात्मिकता और प्राणायाम के गुणों को फिर से खोज रहा है, और दुर्भाग्य की यह सब भारतीय स्कूलों और विश्वविद्यालय में भी नहीं पढ़ाया जा रहा है।  

जब पश्चिम कहता है: "जब तक तुम मेरे भगवान में विश्वास नहीं करते, मैं तुम्हें मार डालूंगा," तब वह भारतीय धर्म के गुणों को फिर से खोज रहा है जहाँ दुनिया में एकमात्र आध्यात्मिकता जीवित बची है - दुर्भाग्य कि भारत के अपने बुद्धिजीवियों द्वारा इसका मजाक उड़ाया जाता है । काश उन्हें पता होता कि वे किस खज़ाने पर थूकते रहते हैं!


- वीरेंद्र 



Comments

  1. ऐसे ही ज्ञान की जरूरत है🙏💕

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  2. बहुत अच्छा 🙏🏻🙏🏻

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  3. Sir i agree your all talks but not agreed a pointable religion hindu,Hindu is a word obtain by britishs 100 years ago our indian culture made by villagers and we all are living in kabilaiye culture , our culture is only kabilaiye culture, all religion and it's holly book made by britishs , Our culture our kabila and villages

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