हर वर्ष शिक्षा बजट में गिरावट क्यों? क्या है प्राथमिकता?




अगर किसी देश को लंबे समय तक कमजोर करना हो...

तो उसकी शिक्षा को कमजोर कर दीजिए।

बाकी सब कुछ धीरे-धीरे अपने आप कमजोर होने लगता है।

क्योंकि...

सड़कें देश नहीं बनातीं।

इमारतें देश नहीं बनातीं।

हथियार देश नहीं बनाते।

देश बनाते हैं उसके पढ़े-लिखे, जागरूक और कुशल नागरिक।


पिछले कुछ दिनों से मैं भारत सरकार के बजट और शिक्षा से जुड़े आधिकारिक आँकड़े देख रहा था।

जो तस्वीर सामने आई, उसने मुझे बेचैन कर दिया।

पहला तथ्य

कुल केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा

2004-05 – लगभग 2.8%

2005-06 – लगभग 3.0%

2006-07 – लगभग 3.2%

2007-08 – लगभग 3.3%

2008-09 – लगभग 3.4%

2009-10 – लगभग 3.7%

2010-11 – लगभग 3.9%

2011-12 – लगभग 4.0%

2012-13 – लगभग 4.2%

2013-14 – लगभग 4.6% (इस अवधि का सबसे अधिक)

इसके बाद तस्वीर बदलने लगती है—

2014-15 – लगभग 4.1%

2015-16 – लगभग 3.8%

2016-17 – लगभग 3.7%

2017-18 – लगभग 3.6%

2018-19 – लगभग 3.5%

2019-20 – लगभग 3.3%

2020-21 – लगभग 3.2%

2021-22 – लगभग 3.1%

2022-23 – लगभग 2.9%

2023-24 – लगभग 2.7%

2024-25 – लगभग 2.6%

2025-26 – लगभग 2.5%

2026-27 – लगभग 2.6%



अर्थात ...

2013-14 में कुल केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा लगभग 4.6% था।

आज यह घटकर लगभग 2.5–2.6% के आसपास रह गया है।

अब कुछ लोग कहेंगे—

"लेकिन शिक्षा का बजट तो रुपये में बढ़ा है।"

बिल्कुल बढ़ा है।

लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि रकम बढ़ी या नहीं।

सवाल यह है कि पूरे केंद्रीय बजट में शिक्षा की प्राथमिकता कितनी है।

किसी भी सरकार की असली प्राथमिकताएँ उसके भाषणों में नहीं...

उसके बजट में दिखाई देती हैं।


दूसरा तथ्य

सरकारी UDISE+ आँकड़ों के अनुसार—

2014-15 में भारत में 11,07,101 सरकारी स्कूल थे।

2023-24 में यह संख्या घटकर 10,17,660 रह गई।

यानी...

करीब 89,441 सरकारी स्कूल कम।

सरकार के अनुसार इसमें कुछ स्कूलों का विलय (merger), rationalisation और कुछ मामलों में बंद होना शामिल है।

लेकिन आम नागरिक के लिए सवाल वही है—

क्या भारत में सरकारी स्कूल बढ़ने चाहिए थे या घटने चाहिए थे?


अब विचार करें...

हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बात करते हैं।

हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं।

हम AI, सेमीकंडक्टर, स्टार्टअप, रक्षा और वैश्विक नेतृत्व की बात करते हैं।

लेकिन...

इन सबके लिए योग्य लोग कहाँ से आएँगे?

वैज्ञानिक कहाँ से आएँगे?

शोधकर्ता कहाँ से आएँगे?

बेहतरीन शिक्षक कहाँ से आएँगे?

ईमानदार अधिकारी कहाँ से आएँगे?

उद्यमी कहाँ से आएँगे?

इन सबकी शुरुआत...

एक स्कूल या गुरुकुल से होती है।


मुझे सड़कों से समस्या नहीं है।

मुझे एक्सप्रेसवे से समस्या नहीं है।

मुझे एयरपोर्ट, रेलवे, रक्षा या विकास से भी कोई समस्या नहीं है।

ये सब ज़रूरी हैं।

लेकिन मेरा सवाल सीधा है—

क्या शिक्षा भी उतनी ही ज़रूरी मानी जा रही है?

अगर जवाब हाँ है...

तो फिर शिक्षा का हिस्सा कुल बजट में लगातार छोटा क्यों होता गया?

अगर जवाब नहीं है...

तो फिर विकसित भारत का सपना किस आधार पर पूरा होगा?


हम अक्सर कहते हैं—

"बच्चे देश का भविष्य हैं।"

लेकिन बजट देखकर कभी-कभी लगता है...

शायद भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता नहीं है।

और अगर भविष्य ही प्राथमिकता नहीं होगा...

तो फिर वर्तमान की सारी उपलब्धियाँ भी अधूरी रह जाएँगी।


क्या भारत अपने भविष्य पर उतना निवेश कर रहा है, जितना उसे करना चाहिए?

क्योंकि...

देश की सबसे बड़ी संपत्ति उसका सोना नहीं होता।

उसकी सबसे बड़ी संपत्ति उसके पढ़े-लिखे नागरिक होते हैं।

अगर शिक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है...

तो शायद हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता आखिर है क्या?


स्रोत:
• भारत सरकार – केंद्रीय बजट दस्तावेज़
• UDISE+ (शिक्षा मंत्रालय)

- वीरेन्द्र सिंह की कीबोर्ड रुपी कलम से 

virendersingh.in
virendersingh16@rediffmail.com

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